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गुरुवार, 04 सितंबर, 2008 को 20:38 GMT तक के समाचार
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पिता की लाश ढोने को मजबूर...

बाढ़ प्रभावित बच्चा
सात साल के इस बच्चे ने बाढ़ में अपने पिता को खो दिया है
सात साल की उम्र में जहां इस बच्चे को खेलना चाहिए था वहां आज वो अपने पिता की लाश ढोने को मजबूर है.

रानीगंज के सरवाहा गांव में बाढ़ से मौतें हुई हैं और उन्हीं में से एक थे महेषरी रिषीदेव जो अपने पीछे चार बच्चे और बीवी को छोड़ गए हैं.

रिषीदेव की विधवा बुरी तरह बीमार है और सात साल के इस बच्चे ने दो दिन से सिर्फ़ दो मुठ्ठी चूड़ा खाया है.

अपने पिता की उत्तरी ढोते इस लड़के से बात करना अत्यंत मुश्किल था. मानसिक रुप से उसे कितना बड़ा सदमा लगा होगा इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि बार बार पूछने पर भी वो अपना नाम तक नहीं बता पा रहा था.

रिषीदेव दूसरे के खेतों में काम करके गुज़ारा चलाते थे और अब उनके परिवार पर गुज़ारे का संकट मंडरा रहा है.

पूरा गांव उसके दुख में साथ तो है लेकिन कोई भी मदद करने की स्थिति में नहीं क्योंकि गांव के लगभग सभी लोगों के घर बार बाढ़ में डूब चुके हैं.

रिषीदेव की विधवा भी कुछ बोल नहीं पाती. उसे शायद अपने दूध पीते बच्चे की चिंता है कि उसे आने वाले दिनों में क्या खिलाएगी.

गांव वालों ने बताया कि रिषीदेव बाढ़ के दौरान मचान बना कर अपने बच्चों के साथ सोए हुए थे.जब पानी भरा तो उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन कई दिनों की भूख से कमज़ोर हो चुके रिषीदेव बच नहीं पाए और पानी की तेज़ धार उन्हें बहा ले गई.

रिषीदेव का अंतिम संस्कार भी नहीं हो सका और लाश बह गई.

बेहाल हैं लोग

 मेरे घर में पांच बच्चे हैं. आप बताइए ये आधा किलो गेंहूं में कितनी बार खाएंगे हम लोग. कुछ और बचा ही नहीं है घर में. कोई राहत नहीं मिली है. हम तो बिना भोजन के मरने वाले हैं
किशोरी यादव

सरवाहा गांव का हाल बुरा है और इसकी आधी से ज़्यादा आबादी अब गांव की मुख्य सड़क पर मचान बना कर रहने को मजबूर है.

इन मचानों में जीवन दुरुह है और गांव के लोग किसी तरह की राहत नहीं पहुंचने की शिकायत करते हैं.

गांव के निवासी किशोरी यादव आधा किलो गेंहू लेकर नहर पार करने जा रहे हैं. वो कहते हैं, " मेरे घर में पांच बच्चे हैं. आप बताइए ये आधा किलो गेंहूं में कितनी बार खाएंगे हम लोग. कुछ और बचा ही नहीं है घर में. कोई राहत नहीं मिली है. हम तो बिना भोजन के मरने वाले हैं."

कुछ ऐसा ही हाल बाकी लोगों का भी है. चानो देवी विधवा है और कहती हैं कि जो भी राहत सामग्री आई है वो दबंग लोगों के हाथ में चली गई है.

इस गांव में लोगों ने हमें सरकारी प्रतिनिधि समझा और मदद की गुहार की. जब हमने बताया कि हम पत्रकार हैं तो उन्होंने कहा कि हम सरकार से उनके लिए मदद मंगवाएं.

गांव में पीने को साफ़ पानी नहीं है, घर डूब चुके हैं और खाने को भोजन नहीं है. ऐसे में कोसी की विपत्ति से वो कैसे निपटेंगे इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

जब मैंने प्रखंड विकास अधिकारी सत्येंद्र राय से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

कुछ अन्य अधिकारियों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि सरवाहा में राहत भेजी ही नहीं गई है क्योंकि राहत सामग्री सरवाहा से अधिक प्रभावित बरगामा भेजी जा रही है.

अधिकारियों का मानना है कि सरवाहा के लोग नहर पार कर रानीगंज के शिविरों से राहत ले जाएंगे लेकिन जब राहत शिविरों में ही खाने पीने का बुरा हाल है तो फिर इन ग्रामीणों को कैसे राहत मिलेगी इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

राहत शिविरस्कूल बन गए शिविर
बाढ़ से निपटने के लिए बनाए गए राहत शिविरों में पुख़्ता व्यवस्था नहीं है.
नावदर्द का कारोबार
अगर जेब में पैसे नहीं है तो बाढ़ में फँसे परिजनों को निकालना मुश्किल है.
राहततबाही का मंज़र...
नेपाल हो या बिहार कोसी नदी के कहर ने दोनों ओर तबाही मचाई है.
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