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ज़मीन विवाद : समझौते के बाद कर्फ़्यू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरनाथ ज़मीन विवाद को लेकर जम्मू-कश्मीर सरकार और अमरनाथ संघर्ष समिति के बीच समझौता हो जाने के बाद प्रशासन ने जम्मू में कर्फ्यू लगा दिया है और देखते ही गोली मारने के आदेश दिए हैं. प्रशासन का कहना है कि उन्हें खबर मिली है कि कुछ चरमपंथी संगठन अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के नेताओं को निशाना बना सकते हैं. ऐसी स्थिति से बचने के लिए जम्मू प्रशासन ने ये कदम उठाया है. भारतीय समय के अनुसार सुबह साढ़े चार बजे दोनों पक्षों के बीच बातचीत के ज़रिए ये समझौता हो पाया और दोनों पक्षों ने हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत अमरनाथ श्राइन बोर्ड को कश्मीर घाटी में अमरनाथ यात्रा के दौरान 40 हेक्टेयर ज़मीन दी जाएगी लेकिन इस दौरान ज़मीन पर श्राइन बोर्ड का मालिकाना हक नहीं होगा. गौरतलब है कि अमरनाथ ज़मीन विवाद के कारण पिछले क़रीब दो महीने से जम्मू और कश्मीर में अलग अलग प्रतिस्पर्धी विरोध प्रदर्शन हो रहे थे जिसमें कई लोग मारे गए. जीत की रैली दरअसल समझौता होने के बाद अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति ने अपनी जीत मानते हुए सुबह-सुबह ही खुशियाँ मनाई थी. लोग खुशियाँ मनाते हुए सड़कों पर निकल आए थे. रविवार को संघर्ष समिति ने जम्मू के मुख्य स्टेडियम में एक रैली बुलाई है.
हालांकि, समझौता हो जाने के बाद समिति ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है लेकिन रैली में बड़ी तादाद में लोगों के पहुँचने की आशंका के मद्देनज़र प्रशासन ने जम्मू में सख्त कर्फ्यू लगा दिया है. प्रशासन ने माँग की थी कि सुरक्षा को देखते हुए अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति रविवार को बुलाई गई अपनी रैली को रद्द कर दे लेकिन समिति ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया है. पुलिस का कहना है कि ऐसी पुख्ता खबर है कि जम्मू के आसपास के कम से कम तीन इलाकों में चरमपंथी छिपे हुए हैं और ये कभी भी हमला कर सकते हैं. ऐसे हालात से निपटने के लिए प्रशासन ने जम्मू में सेना को तैनात कर दिया है. 26वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफ़िसर मेजर जनरल डीएल चौधरी के अनुसार, पूरे शहर और उससे लगे इलाक़ों में सेना की टुकड़ियाँ गश्त लगा रही हैं. जम्मू आने-जाने के सभी रास्तों को बंद कर दिया गया है और देखते ही गोली मारने के आदेश हैं. चरमपंथियों के छिपे होने की संभावित जगहों पर सेना छापे मारने की योजना भी बना रही है. पिछले दिनों जम्मू के ही एक बाहरी इलाके में चरमपंथियों ने एक घर में कुछ लोगों को बंधक बना लिया था. इसके बाद सुरक्षाबल और चरमपंथियों के बीच लगातार 18 घंटे तक फ़ायरिंग होती रही जिसमें तीन चरमपंथियों समेत दस लोग मारे गए थे. क्या है समझौता? अमरनाथ ज़मीन विवाद निपटारे के लिए जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने चार सदस्यीय समिति बनाई थी जो लगातार अमरनाथ संघर्ष समिति से बातचीत कर रही थी. समझौते के बाद संघर्ष समिति ने अपनी 15 माँगें रखी थीं जिसमें से कई सरकार ने मान लीं. इसके तहत राज्य सरकार अमरनाथ यात्रा के दौरान 40 हेक्टेयर ज़मीन श्राइन बोर्ड को दे देगी. लेकिन इस दौरान इसके मालिकाना हक में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
सरकार श्राइन बोर्ड को यह ज़मीन ''यात्रा के दौरान इस्तेमाल'' के लिए देना चाहती थी जबकि बोर्ड चाहता था कि उसे ''ज़मीन पर बिना मालिकाना हक में बदलाव की शर्त के साथ सभी प्रकार के हक '' दिए जाएँ. एवाईएसएस के संयोजक लीला करण शर्मा ने कहा, " बोर्ड को ज़मीन दिए जाने के बाद उसे निरस्त किया गया था लेकिन अब हमें उससे बेहतर शर्तों पर ज़मीन मिल जाएगी और इसके पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे." इसके अलावा एवाईएसएस की इस मांग को सरकार की ओर से समर्थन मिला कि श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड का पुनर्गठन हो और इसे मज़बूत किया जाए. एवाईएसएस के कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ छोटे आरोपों को वापस लेने और बड़े आरोपों पर विचार के लिए नोडल अधिकारी की नियुक्त पर भी सहमति बनी है. इतना ही नहीं एक समिति पिछले दो महीने में व्यवसाय को हुए नुकसान का आकलन करेगी और भारत सरकार को मुआवजे के लिए रिपोर्ट भेजेगी. घाटी की प्रतिक्रिया फिलहाल इस समझौते पर कश्मीर घाटी से राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया नहीं आई है. इनकी प्रतिक्रिया इसलिए मायने रखती है क्योंकि जब सरकार ने दस जुलाई को श्राइन बोर्ड को ज़मीन देने का फ़ैसला किया था तो कश्मीर में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए थे जिसके बाद सरकार ने ज़मीन वापस लेने का फ़ैसला किया. |
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