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गुरुवार, 14 अगस्त, 2008 को 13:59 GMT तक के समाचार
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आम लोगों को भी विश्वास में लेना होगा

प्रदर्शनकारी
कश्मीर में स्थिति बहुत नाज़ुक है
कश्मीर घाटी में हालात अराजक बने हुए हैं और लोगों मे गुस्सा है. उनका कोई नेता भी नज़र नहीं आ रहा हालांकि पिछले दो दिनों में कोई बड़ी अप्रिय घटना नही हुई है और राजधानी श्रीनगर में कर्फ़्यू भी नहीं लगाया गया है.

इक्का दुक्का दुकानें भी खुली हैं और लोगों ने अपनी ज़रुरत की चीज़ें भी ख़रीदीं.

विश्लेषक मानते हैं कि पिछले दो दिनों में प्रशासन की तरफ़ से संयम बरतने से हिंसक घटनाओं में कमी आई है, लेकिन अब भी अविश्वास और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है.

विश्लेषकों का ये भी मानना है कि घाटी और जम्मू के बीच विभाजन बहुत गहरा नज़र आता है, आम आदमी घाटी की घटनाओं की तुलना जम्मू की घटनाओं से करता है और उसे लगता है कि सुरक्षाबलों ने उनके साथ ज़्यादतियाँ की हैं.

हालांकि ये नहीं कहा जा सकता कि घाटी के लोगों की भावनाओं का राजनीतिकरण नही हुआ है, या उनके विचार उन शक्तियों से प्रभावित नहीं होते हैं जो अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए घाटी में अस्थिरता के माहौल को लंबा खींचना चाहते हैं.

पर ये एक तथ्य है कि कारण कोई भी हो, घाटी में हालात नाज़ुक बने हुए हैं. और पिछले सालों में जो अलगाववादी नेता हाशिए पर पंहुच गए थे, अब अपने लिए राजनीतिक भूमिका तलाश कर रहे हैं.

सकारात्मक असर

घाटी के फल उत्पादकों ने सरकार पर जम्मू श्रीनगर हाईवे खुलवाने के लिए दबाव बनाने की रणनीति के तहत, मुज़फ़्फ़राबाद की तरफ़ कूच किया.

इस मार्च के दौरान हिंसा हुई और कई लोगों की जानें गईं, अब ये मुद्दा पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है. अलगाववादी नेता इस मुद्दे के सहारे अपनी खोई साख़ पाने की कोशिश में लगे हैं.

जेकेएलएफ़ नेता यासिन मलिक कहते हैं, “ मुज़फ़्फ़राबाद रास्ता खोलने पर भारत पाकिस्तान सरकार दोनों ही सहमत हैं, इस फ़ैसले को लागू करने की ज़रुरत है, और लोग इसी मांग को लेकर रास्ते पर उतरे हैं.”

लेकिन ऐसा नहीं है कि घाटी में बिगड़ी स्थिति में अलगाववादी नेता ही अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश कर रहे हैं.

मुख्यधारा की पार्टियां, और उनमें भी वो पार्टियां जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले दिनों तक सरकार में रही हैं, बातचीत का रास्ता खोलने या विश्वास का माहौल बनाने की कोशिशों के बदले हालात के हाथों खेल रही हैं.

ऐसे में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वो आम कश्मीरी को ये विश्वास दिलाए कि उसके साथ ज़्यादती नहीं की जाएगी और जो ज़्यादतियाँ उनके साथ हुई भी हैं, उसकी जवाबदेही तय की जाएगी.

प्रशासन ने कुछ ऐसे कदम उठाए भी हैं जिनके कुछ कुछ सकारात्मक असर नज़र आ रहा है. सरकार को सिर्फ़ राजनीतिक दलों को ही विश्वास में नही लेना है उसे आम लोगों को भी विश्वास में लेना होगा.

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