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झुग्गियों से मंत्रालय तक का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या कोई आलू प्याज बेचने वाला या दवाई की कंपनी में साधारण काम करने वाला व्यक्ति विधायक या फिर मंत्री बन सकता है. अगर आपको लगता है कि ऐसा नहीं हो सकता तो आप ग़लत हैं क्योंकि ये संभव है. महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे कृपाशंकर सिंह रोज़ी रोटी के लिए दवा कंपनी में भी काम कर चुके हैं और खाली समय में आलू प्याज बेच चुके हैं ताकि नियमित आमदनी हो सके. छोटे कामों से राजनेता बनने का सफ़र आसान तो नहीं रहा लेकिन वो कहते हैं कि मेहनत और ईमानदारी से काम किया जाए तो ये संभव है. कृपाशंकर 1971 में जौनपुर से मुंबई पहुंचे थे किसी काम की तलाश में. उनके कुछ संबंधी मुंबई में थे जिनके पास वो काम की तलाश में आए. मुंबई ड्रीम्स की विशेष शृंखला के तहत कृपाशंकर सिंह की कहानी के बाद इस हफ्ते और भी लोगों की कहानी से आप वाकिफ़ होंगे जो जीवन में संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़े हैं. वो कहते हैं, ‘मैं बेरोज़गार था. काम की तलाश थी. सोचा मुंबा देवी कई लोगों को मुंबई में रोज़गार देती हैं तो मेरा भी गुज़ार हो जाएगा. मेरी शादी हो चुकी थी लेकिन बीवी को घर छोड़ कर आया था.’ सांताक्रूज के इलाक़े में वो अपने संबंधियों के साथ दो कमरे की झुग्गी बस्ती में रहते थे जहां एक कमरे में कई लोगों को सोना पड़ता था. वो कहते हैं, ‘मुझे पहला काम मिला दवाईयों की कंपनी रशल फ़ॉर्मास्युटिकल्स में नौकरी मिली आठ नौ रुपए प्रतिदिन मिलते थे. फिर तीन साल के बाद रोज़ फ़ार्मास्युटिकल्स में काम मिला. लेकिन पैसे इतने नहीं थे कि परिवार को ला पाता.’ रोज़ फ़ॉर्मास्युटिकल्स में अस्थायी काम था जहां कुछ दिनों के लिए छुट्टी दी जाती थी ताकि नौकरी स्थायी न हो सके, इन दिनों में कृपाशंकर आलू प्याज बेचते थे. वो बताते हैं, ‘ये वो समय था जब मैं फ्री होता था दवा कंपनी के काम से तो मैं अपने भईया की दुकान से दस किलो आलू और दस किलो प्याज प्लास्टिक की थैली में ले लेता था और आस पास बेचता था. इससे मुझे आठ दस रुपए की आमदनी होती थी. मतलब ये कि मैं खाली नहीं बैठता था. कुछ कमा लेता था.’ उनके नज़दीकी लोग बताते हैं कि एक ज़माने में कृपाशंकर जी के पास अपने बच्चे के लिए दूध तक के पैसे नहीं होते थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कभी किसी को दिक्कतों का अहसास नहीं होने दिया. अपनी दिक्कतों में भी वो दूसरों की मदद करते रहे और इसीलिए आज उन्हें लोग पसंद करते हैं.
धीरे धीरे नौकरी पक्की हुई और झुग्गी में उन्होंने एक घर लिया और परिवार को ले आए. लेकिन राजनीति की तरफ़ कैसे झुकाव हुआ. वो कहते हैं, ‘परिवार में राजनीतिक माहौल था क्योंकि पिताजी स्वतंत्रता सेनानी थे. मैं झुग्गी की समस्याओं के लिए प्रयास करता था. स्थानीय स्तर पर काम करता था. लेकिन स्वर्गीय इंदिरा गांधी से मिलने के बाद मैं अधिक सक्रिय हुआ.’ नेता के दर्शन से पेट नहीं भरता लेकिन वो मुलाक़ात कैसी थी, कृपाशंकर कहते हैं, ‘मैं अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर इंदिरा जी के एक कार्यक्रम में उनको देखने गया था. लेकिन किस्मत से मुलाक़ात हुई. पास पहुंचा तो उन्होंने पूछा कि कहां के हो, मैंने कहा जौनपुर का हूं यहां काम करता हूं, उन्होंने पूछा छुट्टी है आज. मैंने कहा नहीं, तो बोलीं, छुट्टी लेने से पेट नहीं भरता, पार्टी का काम करो लेकिन नौकरी मत छोड़ो.’ कृपाशंकर के अनुसार ये बात उनके मन में बस गई और फिर उस दिन से वो राजनीति में अधिक सक्रिय हो गए उन्होंने नौकरी कई सालों के बाद ही छोड़ी. कांग्रेस में निचले स्तर पर कृपाशंकर सिंह ने सालों काम किया. बाद में पार्टी के राज्य महासचिव बने और नब्बे के दशक में एमएलसी और फिर विधायक बने. कांग्रेस की पिछली सरकार में उन्हें गृह राज्य मंत्री का कार्यभार मिला जिसे उन्होंने बड़ी ज़िम्मेदारी से निभाया. अंडरवर्ल्ड के सफाए में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है. कैसा लगता है इतने संघर्ष के बाद ऊपर पहुंचने में, वो कहते हैं, ‘हर आदमी विधायक या मंत्री नहीं बन सकता. लेकिन मेहनत करें तो आपको आपकी मंजिल मिल ही जाती है. अब मैं फ्लैट में रहता हूं. लेकिन जब समय मिलता है सब्ज़ी खरीदने जाता हूं. उनसे बात करता हूं. पाव भाजी खाता हूं. मैं अभी भी झुग्गियों में रहने वालों का दुख समझता हूं क्योंकि मैं वहां रह चुका हूं.’ कृपाशंकर ने मराठी संस्कृति को अपना लिया है. वो फर्राटे से मराठी बोलते हैं और उनका मानना है कि जो कोई भी मुंबई आता है उसे मराठी तौर तरीके अपनाने चाहिए तभी सभी लोग समरसता से रह सकेंगे. अपनी मेहनत से आगे बढ़ने वाले कृपाशंकर आज उन सभी लोगों के प्रेरणास्त्रोत हैं जो बिहार और उत्तर प्रदेश से मुंबई आते हैं रोज़ी रोटी की तलाश में. उन्हें भी लगता है कि मेहनत करें तो आगे बढा जा सकता है. यह कहानी आपको कैसी लगी. अपनी राय hindi.letters@bbc.co.uk पर अपनी राय भेजें. |
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