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पान के पत्तों से बंदरगाह तक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोचने पर किसी का एकाधिकार नहीं होता है और जो बड़े सपने देखता है वही उन सपनों को पूरा कर पाता है. ये कहना है कि निखिल गांधी का जिन्हें भारत में निजी स्तर पर बंदरगाह बनाने, रेल की पटरियां बिछाने और स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन बनाने का श्रेय जाता है. निखिल गांधी पहली पीढ़ी के व्यवसायी हैं जिन्होंने अपने दम पर करोड़ों की कंपनी खड़ी की है. उनकी कंपनी स्किल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड भारत में बंदरगाह बनाने से लेकर कई अन्य बड़ी परियोजनाओं को पूरा कर रही है. इस कंपनी ने पिछले दिनों पिपावाव बंदरगाह का निर्माण किया. भारत में पहली बार किसी निजी कंपनी को ऐसा ठेका दिया गया था. निखिल गांधी के व्यवसायिक जीवन की शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन इस मेहनती व्यक्ति में किशोरावस्था से ही बिज़नेस करने के गुण भरे हुए थे. निखिल के पिता कोलकाता में टारप्यूलिन बनाने का छोटा मोटा काम करते थे. कोलकाता में जब निखिल कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रहे थे तभी उन्होंने छोटा व्यवसाय शुरु कर दिया था. (मुंबई ड्रीम्स की शृंखला के तहत निखिल गांधी की कहानी पेश है. आने वाले दिनों में और भी ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी). वो बताते हैं, ‘मैं कोलकाता से पान के पत्ते खरीद कर मुंबई लेकर आता था और यहां घाटकोपर और अन्य इलाक़ों में पान दुकानों में पान के पत्ते बेचा करता था. ये काम हर पंद्रहवें दिन पर किया करता था जिससे मुझे आमदनी होती थी.’ इस काम से तीन साल में निखिल ने 45 हज़ार रुपए की पूंजी बनाई और इसी पूंजी से व्यवसाय खड़ा करने का सपना लेकर तीस साल पहले निखिल मुंबई पहुंचे. इस छोटी सी राशि के अलावा निखिल के पास सिर्फ उनके सपने थे. न कोई मैनेजमेंट की डिग्री और न ही किसी बड़े व्यवसायी से जानपहचान. फिर मौका कैसे मिला.. वो कहते हैं, ‘मुझे समुद्र से गहरा प्यार था. मैं चाहता था कि कुछ भी करूं वो समुद्र से जुड़ा हो. यही सोचकर मैंने नौसेना में कुछ काम करने की सोची और फिर प्रयास करने पर मुझे नौसेना से एक ठेका मिल गया.’ निखिल के जीवन का यह पहला ठेका झाड़ूओं की सप्लाई करने का था. निखिल ने यह काम बखूबी निभाया तो उन्हें सफाई में इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़ों की आपूर्ति का ठेका मिला. निखिल ये कपड़े लेने के लिए उत्तर प्रदेश के अमरोहा आते थे जहां उन्हें अच्छी क्वालिटी के ये कपड़े सस्ते दामों पर मिल जाते थे. फिर ट्रेन में वो इन्हें लेकर मुंबई पहुंचते. मुश्किल भरे दिन वो कहते हैं, ‘वो दिन बड़ी मुश्किलों भरे होते थे. एक बुरा अनुभव भी हुआ था. मेरा एक काम रुका पड़ा था. जिस व्यक्ति से मेरा काम होना था उस व्यक्ति ने मुझे भोजन पर बुलाया और कहा कि मेरे साथ लंच में शराब पीओ तभी काम होगा. मैं शराब नहीं पीता. मैंने मना कर दिया और ये काम मुझे नहीं मिला. तब मुझे सबसे अधिक दुख हुआ. हालांकि बाद में जब यही व्यक्ति मिले तो उन्होंने भी शराब छोड़ दी थी और साई बाबा के भक्त हो गए थे.’ निखिल कहते हैं कि उन्होंने मुसीबत के समय भी कभी हार नहीं मानी और अपने काम में लगे रहे. मुश्किल के दिनों में वो मुंबई के नरीमन प्वाइंट पर बैठ कर अपने पसंदीदा समुद्र को देखा करते थे. वो कहते हैं, ‘मैं हमेशा सोचता था कि इस पानी से जुड़ा कोई काम ही करूं. मैं नौसेना के साथ काम करता रहा और धीरे धीरे मुझ पर उनका विश्वास जमा. अब देखिए मुझे कुछ सालों पहले नौसेना ने ही बंदरगाह बनाने का ठेका दिया और यह काम सफलता से पूरा हुआ.’ तो क्या अब निखिल नरीमन प्वाइंट जाते हैं, वो कहते हैं, ‘बिल्कुल जाता हूं और उसी जगह पर बैठता हूं जहा पहले बैठता था. बस टाई और कोट खोल कर गाड़ी में रख देता हूं. वहां तो मैं कुरमुरे भी खा लेता हूं और कभी कभी कोल्ड ड्रिंक भी पी लेता हूं. वहां मुझे सूकून मिलता है.’ इतने छोटे से काम से करोड़ों रुपए की कंपनी का मालिक बनने मे कैसा लगता है उन्हें, निखिल कहते हैं, ‘मेरी मां ने बचपन में ही मुझे एक मंत्र दिया था. कोई काम छोटा नहीं होता, साथ ही दूसरों से अलग सोचो. बड़ा सोचो तभी आगे बढ़ोगे. मैंने इसी मंत्र का पालन किया है.’ आने वाली पीढ़ियों को निखिल यही सलाह देते हैं, ‘सोचने पर किसी को मोनोपॉली नहीं है, जब तक बड़ा सपना नहीं देखोगे तब तक बड़ा काम कैसे कर पाओगे. दूसरों से अलग सोचो, कल की नहीं दस बीस साल आगे की सोचो वर्ना भीड़ का हिस्सा बन जाओगे. सपने देखने की हिम्मत रखो क्योंकि जो हिम्मत करता है खुदा भी उसी की मदद करते हैं. ’ (यह कहानी आपको कैसी लगी. अपनी राय हमें hindi.letters@ bbc.co.uk पर भेजिए) | इससे जुड़ी ख़बरें मुंबई के कायाकल्प की तैयारी23 सितंबर, 2003 | कारोबार लौट के हुनरमंद घर को आए01 मई, 2005 | पहला पन्ना तेज़ी के पीछे क्या है27 जून, 2005 | कारोबार चीनी मुद्रा युआन के मूल्य का प्रभाव27 जुलाई, 2005 | कारोबार 'रिश्वतख़ोरी में भारत और चीन अव्वल'04 अक्तूबर, 2006 | कारोबार दिल्ली के दुकानदारों को राहत नहीं मिली18 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस हाजीपुर में केला है तो जीवन है25 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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