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चीनी मुद्रा युआन के मूल्य का प्रभाव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीनी मुद्रा युआन के पुनर्मूल्यांकन से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा जगत में तो हलचल मची ही है, पर भारत में ख़ास हलचल मची है. इसकी वजह यह है कि भारत और चीन सिर्फ पड़ोसी नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी भी है. ऐसा कोई भी घटनाक्रम, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण होता है. चीनी मुद्रा युआन के पुनर्मूल्यांकन में हुआ यह है कि चीनी मुद्रा अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले क़रीब दो प्रतिशत महँगी हो गई है. यानी पहले एक डॉलर के बदले 8.28 युआन मिल सकते थे, अब 8.11 युआन मिलेंगे. किसी भी मुद्रा के महंगे होने के कई अर्थ होते हैं. एक अर्थ तो यह होता है कि उस मुद्रा से जुड़ी वस्तुओं की ख़रीदारी करना थोड़ा महंगा हो जायेगा. अमरीका की इच्छा यह अमरीका चाहता भी था. अमरीका की चिंता यह है कि चीन के सस्ते उत्पाद और खासतौर टेक्सटाइल उत्पाद अमरीका में मार मचाए हुए हैं. अमरीका अरसे से चीन पर इस क़दम के लिए दबाव डाल रहा था बल्कि अमरीका का दबाव तो ये था कि यह पुनर्मूल्यांकन 15-20 प्रतिशत का हो. पर चीनी मुद्रा करीब दो प्रतिशत ही महंगी हुई. अन्य शब्दों में जो अमरीका चाहता था, वह हुआ तो, पर क़ायदे से नहीं हुआ. वैसे इसकी आशंका अमरीका के नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री राबर्ट मंडेल ने अप्रैल में यह कह कर जाहिर कर दी थी कि चीनी पुनर्मूल्यांकन बाल्टी में एक बूंद की तरह होगा.यानी उतना नहीं होगा,जितनी अपेक्षा की जा रही थी. असर
किसी मुद्रा के महंगे होने का एक असर यह होता है कि उस मुद्रा के ज़रिए निवेश करना महंगा होता जाता है. एक असर यह होता है कि उस मुद्रा के ज़रिए होने वाला निर्यात महंगा हो जाता है. यानी इस क़दम से चीन में निवेश करना महंगा होगा और चीन से बाहर जाने वाला सामान भी महंगा होगा. सिद्धांत के हिसाब से देखें, तो इस क़दम से चीन में किए जाने वाला विदेशी निवेश हतोत्साहित होगा और चीन के सामान अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा होगा. अब चीन का सामान अगर अंतरराष्ट्रीय सामान में महंगा होगा, तो उसके प्रतिद्वंदियों के लिए यह प्रसन्नता की बात होनी चाहिए. भारत के लिए अच्छा भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों के लिए यह प्रसन्नता की बात है कि चीन के उत्पादों के मुक़ाबले उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेहतर स्थिति में होंगे. ग़ौरतलब है कि चीन कपड़ों के बाजार में भारत का महत्वपूर्ण प्रतिद्वंदी है.
भारतीय टेक्सटाइल बाज़ार की कंपनियाँ अरसे से यह ख़बर सुनने को बेताब थीं कि चीनी युआन महंगा हो गया है. चीनी युआन के महंगे होने की उम्मीद की वजह से कुछ समय पहले भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों-बॉम्बे डाइंग और रेमंड के शेयरों के भाव बाजार में बढ़े और फिर युआन का अधिमूल्यन न होने से ये भाव फिर कम हो गए. अब युआन के महंगे होने से भारतीय टेक्सटाइल बाज़ार में प्रसन्नता तो है, पर जानकारों का यह भी कहना है कि दो प्रतिशत का अधिमूल्यन इतना ज़्यादा नहीं है कि भारत को उसका भरपूर सकारात्मक लाभ मिल सके. भारत को युआन के अधिमूल्यन का लाभ दो ही स्थितियों में मिल सकता है, एक- जब चीन में निवेश करना भारत में निवेश करने के मुक़ाबले बहुत महंगा हो जाए. दो, चीन से माल मंगाना, भारत से माल मंगाने के मुक़ाबले बहुत महंगा हो जाए. इतना गंभीर नहीं पर दो प्रतिशत की महंगाई ऐसी महंगाई नहीं है, जिसकी वजह से चीन में होने वाला निवेश या चीन से होने वाला निर्यात प्रभावित हो. उम्मीद है कि चीनी कंपनियां इस स्थिति से अपनी लागत-कुशलता और कार्य-कुशलता से निपट लेंगी. चीन की स्थिति पर प्रभाव तब पड़ेगा, जब कम से कम दस प्रतिशत का अधिमूल्यन हो. ग़ौरतलब है कि युआन के महंगे होने का फायदा अगर किसी देश को मिलेगा, तो वह भारत ही है क्योंकि टेक्सटाइल के बाजार में चीन को टक्कर देने की स्थिति भारत की है. भारत में भी चीन की तरह सस्ती दरों पर श्रमिक आसानी से उपलब्ध हैं. टेक्सटाइल क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा
भारत के टेक्सटाइल निर्यात की स्थिति से इस बात के संकेत मिलते हैं कि इसकी तैयारियां भी जोरदार चल रही हैं. पिछले दो सालों में तमाम टेक्सटाइल कंपनियों ने अपने कारोबार में करीब 70 करोड़ डॉलर का निवेश किया है. 2005-2006 में भारतीय टेक्सटाइल उद्योग से 15 अरब डॉलर के निर्यात की उम्मीद है. 2004-05 में यह आंकड़ा 13.6 अरब डॉलर का था. एक्जिम बैंक द्वारा कराये गये एक शोध के मुताबिक निर्यात सन् 2014 में 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है यानी विश्व के टेक्सटाइल निर्यात बाजार का करीब पच्चीस प्रतिशत. पर चीन भी पीछे नहीं है. चीन के टेक्सटाइल उद्योग की विकास दरें भी तेजी से बढ़ रही हैं. निर्यात की विकास दर को बड़ा झटका तब ही लगेगा, जब चीनी मुद्रा दस प्रतिशत से ज्यादा महंगी होगी। और ऐसा होने के आसार फिलहाल नहीं हैं. सॉफ़्टवेयर में मुक़ाबला टेक्सटाइल के अलावा एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां भारत और चीन के बीच भविष्य में प्रतिस्पर्धा होने की उम्मीद है. यह क्षेत्र है-कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर का क्षेत्र. कंप्यूटर हार्डवेयर के मामले में यानी कंप्यूटर से जुड़े उपकरणों के मामले में चीन की प्रगति बहुत जोरदार रही है. 1990 में चीन में कंप्यूटरों का कुल कारोबार एक अरब डॉलर का था, जो 2000 में बढ़कर 23 अरब डॉलर का हो गया. सस्ते श्रम और बेहतरीन आधारभूत ढांचे की वजह से कंप्यूटर हार्डवेयर के मामले में चीन अब विश्व बाजार में एक महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी बन गया है. अब चीन ने साफ्टवेयर के मामले में ध्यान देना शुरु किया है. फरवरी, 2000 के पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जर्नल में इस आशय का संदेश दिया गया था कि राष्ट्र की सुरक्षा और बेहतरी तब तक संभव नहीं है, जब तक साफ्टवेयर के क्षेत्र में भरपूर विकास न हो. पर फिलहाल साफ्टवेयर के मामले में भारत बहुत मजबूत स्थिति में है. इस मजबूत स्थिति को खतरा तब तक नहीं है, जब तक चीन में सस्ते और बेहतर साफ्टवेयर प्रोग्राम विकसित करने की काबलियत पैदा नहीं हो जाती. नोट करने की बात यह है कि युआन अगर और महंगा हुआ, तो चीन से साफ्टवेयर के निर्यात की संभावनाएं कमजोर ही पड़ेंगी. मुद्रा का मूल्य
किसी वस्तु का मूल्य मुद्रा में ही चुकाया जाता है, पर हर मुद्रा का अपना मूल्य होता है. मुद्रा के मूल्य का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय बाजारों के सौदों में महत्वपूर्ण हो जाता है. हर देश की मुद्रा , उस देश की आर्थिक स्थिति का संकेतक होती है. मजबूत आर्थिक स्थिति वाले देशों की मुद्रा मजबूत होती है. जैसे अगर एक डॉलर के मुकाबले 43 रूपए मिलते हैं, तो यह कहा जायेगा कि रूपए की एक्सचेंज रेट डॉलर के मुकाबले 43 रूपए है. अगर एक डॉलर के बदले 41 रूपए मिलने लगें, तो कहा जायेगा कि रुपया मज़बूत हो गया डॉलर कमजोर हो गया और अगर एक डॉलर के बदले 47 रूपए मिलने लगें, तो कहा जायेगा कि रुपया कमजोर हो गया और डॉलर मज़बूत हो गया. 1927 में भारत के रूपए की एक्सचेंज रेट तय की गयी थी-एक शिलिंग और छह पेंस.डॉलर के मुकाबले भारत की एक्सचेंज रेट इस प्रकार रही है- |
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