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चीन में पीछे छूटते ग़रीब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जिन हुआ को जब कभी अपने घर परिवार वालों से मिलना होता है तो उन्हें घंटों पहाड़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है. ऐसा कठिन श्रम उनके जीवन का हिस्सा है क्योंकि वह ग़रीब है और ऐसी ही किस्मत उन तमाम चीनी लोगों की है जो ग़रीब हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी ग़रीबी का दंश झेल रहे इन ग़रीबों का बीजिंग और शंघाई की चमचमाती दुनिया से कोई लेना देना है. जिन हुआ का घर निंगक्सिया प्रांत के लिउडियान गांव में है जो पहाड़ियों में बसा हुआ है. जिन के माता पिता अपना घर बना नहीं सकते और किराए के लिए पैसे नहीं हैं. इसलिए उन्हें एक गुफा में रहना पड़ता है. बरसों से पेट में दर्द झेल रही जिन अपना इलाज़ भी नहीं करवा सकती. वो कहती है " मैं रात रात भर दर्द के मारे सो नहीं पाती.मेरे पास इलाज के लिए पैसे नहीं है. " जिन के पति जिन जियाओतिंग सूखी मिट्टी में खेती कर के गुज़ारा करते हैं. जिन कहते हैं कि उनकी सालाना आमदनी 30 डॉलर से अधिक नहीं होती लेकिन उन्हें टैक्स देना पड़ता है. आदर्श गांव
जिन जैसे कई छोटे किसानों के लिए टैक्स एक बड़ा मसला है. चीन के निर्धनतम किसान शहरों के आधुनिकीकरण की कीमत चुका रहे हैं. दुनिया भर में अमीर और ग़रीब के बीच की सबसे बड़ी खाई चीन में ही है. चीन के निर्धनतम प्रांतों में से एक गुयान के मेयर मा फू स्थानीय स्तर पर ग़रीबी कम करने के प्रयासों के बारे में मीडिया को बताने से नहीं चूकते. फू की योजना के तहत कुओं की खुदाई, पेड़ लगाने और गांवों में गायों के लिए गौशालाएं बनाई गई हैं. ग़रीबों के लिए नए घर बनाए गए हैं और उनमें टीवी का कनेक्शन भी है लेकिन निवासी इससे खुश नज़र नहीं आते. एक निवासी कहते हैं " इस परियोजना से हमें कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ है. स्कूल की फीस देने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं. " एक अन्य निवासी कहती हैं कि उनके पास खाने को तो है लेकिन बिजली नहीं है. सरकार कोई मदद नहीं कर रही है. संपन्नता का सपना पहाड़ों की गुफ़ाओं में रहने वाले जिन के परिवार के पास खाने के लिए हमेशा आलू और नूडल्स ही मिले हैं. इस परिवार का कहना है कि उन्होंने ग़रीबी को अपनी किस्मत मान लिया है. हालांकि चीन का एक तबका तेज़ी से आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ रहा है और देश की अर्थव्यवस्था पर उनकी पकड़ बढ़ती जा रही है. |
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