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तेज़ी के पीछे क्या है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेज़ी के पीछे क्या है शेयर बाजार फिर तेज़ी से उछाल भर रहा है. रिलायंस समूह के बंटवारे के बाद मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक सात हजार का आँकड़ा पार कर गया है. 23 जून 2005 को यह 7120 बिंदु पर बंद हुआ है. इस तेज़ी के पीछे क्या है. क्या सिर्फ रिलायंस के विवाद का निपटारा है या कुछ और. आम तौर पर भारतीय शेयर बाजारों में ऐसा देखा गया है कि बहुत तेजी से उठते शेयर बाज़ार के पीछे कुछ घोटाले छिपे होते हैं. अतीत में हर्षद मेहता, केतन पारिख जैसे शेयर बाजार के खिलाड़ियों की कलाकारी से बाजार बहुत तेजी से उठा था. पर 7000 के पार जाने वाले शेयर बाजार का विश्लेषण करें, तो इस बार कुछ नयी बातें साफ होती हैं. पहली बात तो यह है कि सिर्फ रिलायंस का शेयर बाजार को आगे नहीं ले जा रहा है. रिलायंस की शेयर बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका जरुर है, पर इस तेजी में अन्य शेयरों का भी योगदान है. खास तौर पर इनफोरमेशन टेक्नोलोजी के शेयरों का योगदान खासा महत्वपूर्ण है. भारतीय वित्तीय बाजारों ने बीते कुछ सालों में एक विशिष्ट छवि अर्जित की है. भारतीय अर्थव्यवस्था की छवि पूरे विश्व में अब एक बहुत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था की बन रही है. इसलिए स्वाभाविक है कि पूरे विश्व के निवेशक भारतीय बाजार में पैसा लगायें. ये पैसा विदेशी निवेशक संस्थानोँ यानी एफआईआई यानी फारेन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स के जरिये लगाया जाता है. पिछले छह महीने का विश्लेषण करें, तो साफ होता है कि भारतीय बाजार में अब तक अमेरिकन और यूरोपियन संस्थागत निवेशक ही निवेश कर रहे थे, पर अब जापानी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों को गंभीरता से लेना शुरु किया है. जापानी निवेशकों ने भारतीय बाजारों में पिछले छह महीने में 1.5 अरब डालर का निवेश किया है. उम्मीद है कि इस साल के अंत तक जापानी निवेशकों का निवेश चार अरब डालर तक पहुंच जायेगा. गौरतलब है कि जापानी संस्थागत निवेशक बहुत ही सावधानी पूर्वक निवेश करते हैं. अमेरिकन निवेशकों की प्रवृत्ति के विपरीत जापानी निवेशक दीर्घकाल के लिए निवेश करते हैं. और जब जापानी निवेशक भारतीय बाजारों को भरोसे योग्य मान रहे हैं, तो मान लिया जाना चाहिए कि भारतीय शेयर बाजार अब परिपक्वता का एक स्तर हासिल कर चुके हैं. इसलिए वर्तमान तेजी को सिर्फ रिलायंस-जनित तेजी न मानकर एक समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका एक ठोस आधार है. मजबूत औद्योगिक विकास का आधार, तेजी से विकसित होता हुआ सेवा क्षेत्र, इस ठोस आधार के कारक हैं. बीपीओ से केपीओ तक भारत में कालेज जाने वाले नौजवान से बीपीओ का मतलब पूछिये तो खट से बता देगा, बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानी काल सेंटर यानी अच्छी-खासी कमाई. बीपीओ के कारोबार के तहत विदेशी कंपनियों की कुछ कारोबारी प्रक्रियाओं को भारत में संपन्न किया जाता है. भारत में इन कारोबारी प्रक्रियाओँ को निपटाना सस्ता पड़ता है. जैसे न्यूयार्क के किसी बैंक को अपने ग्राहक को किश्त समय पर चुकाने की याद दिलानी है, तो यह काम भारत के जरिये करवाना सस्ता पड़ेगा. यानी गुड़गांव से इस आशय की टेलीफोन काल सस्ती पड़ेगी, क्योंकि इस काम को करने वाले भारत में सस्ती दरों में मिल जाते हैं. काल सेंटर उर्फ बीपीओ कारोबार भारत में पिछले कुछ सालों में खासा फला-फूला है.
भारतीय काल सेंटरों में भारतीय लड़के-लड़कियां वो काम कर रहे हैं, जो न्यूयार्क या लंदन में किसी टेलीफोन रिसेप्शनिस्ट को करना चाहिए. अच्छी अंगरेजी बोलने वाले भारतीय नौजवानों के बीपीओ से अच्छी कमाई कर रहे हैं. पर हाल का घटनाक्रम बताता है कि भारत सिर्फ फोन रिसेप्शनिस्टों का ही देश नहीं है, कलाकारों, प्रोफेसरों, प्रबंधकों का भी देश है यानी भारत से सिर्फ बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग के अलावा नालेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग-केपीओ भी हो सकती है. केपीओ से आशय उन कारोबारों में भारतीय योगदान से है, जिनमें उच्च स्तरीय भारतीय क्षमताओं का योगदान हो-जैसे प्रबंधन, शिक्षण, विज्ञापन लेखन, संपादन. मसलन अमेरिका की किसी कंपनी को अपनी बिक्री के एक साल के आंकड़ों के विश्लेषण से करके कुछ प्रबंधकीय निष्कर्ष निकालने हैं, तो इस काम में भारत के प्रबंधक मदद कर सकते हैं. उधर से आंकड़ें आयेंगे, इधर से विश्लेषण जायेगा. न्यूयार्क के पूरे अखबार का संपादन गुड़गांव में बैठे संपादक लोग कर सकते हैं. न्यूयार्क के बच्चों को दिल्ली का एक प्रोफेसर एकाउंटिंग पढ़ा सकता है. इसकी साफ वजह है कि भारत में गुणवत्ता वाले लोग विकसित देशों की मुकाबले बहुत ही कम दर पर उपलब्ध हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली में पंद्रह साल का तजुरबा रखने वाले प्रबंध विज्ञान का प्रोफेसर पचास हजार रुपये में मिल सकता है, इस क्षमता का प्रोफेसर अमेरिका में कम से डेढ़ लाख रुपये में मिलेगा. वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये प्रोफेसर क्लास लेगा और इंटरनेट के जरिये एसाइनमेंट चेक करेगा. इम्तहान, वाइवा भी वीडियो कांफ्रेंसिग और इंटरनेट के जरिये हो सकते हैं. कंप्यूटर से जुड़े कारोबारों पर अध्ययन करने वाली संस्था नासकौम के मुताबिक पूरे विश्व में नालेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग का कारोबार सन् 2010 तक करीब 17 अरब डालर का होगा, इसमें भारत अपनी क्षमताओं के बूते इसमें से 12 अरब डालर का कारोबार झटक लेगा. म्युचुअल फ़ंड यानी मिला-जुला फ़ंड इधर अखबारों में म्युचुअल फ़ंड के बारे में बहुत खबरें होती हैं. अकसर सवाल पूछे जाते हैं कि म्युचुअल फ़ंड का शेयर बाजार से क्या रिश्ता होता है. म्युचुअल का हिंदी में आशय होता है परस्पर और फ़ंड का मतलब पैसा, जमा राशि. म्युचुअल फ़ंड से आशय उस संस्था से है, जो तमाम छोटे निवेशकों से पैसा इकठ्ठा करके उसे पूंजी बाजार में लगाती है, शेयरों में, बांडों में.
शेयर बाजार में निवेश खासा ज़ोखिम वाला होता है और इसके लिए खासी जानकारियों की भी जरुरत होती है. एक छोटा निवेशक यह नहीं कर सकता. तो इसके लिए रास्ता यह निकाला गया है कि छोटे निवेशक अपनी रकम म्युचुअल फ़ंड के हवाले करें, जो अपनी विशेषज्ञ क्षमताओं से बाजार का विश्लेषण करें और उसमें पैसा लगायें. म्युचुअल फ़ंड तमाम तरह की योजनाएं निवेशकों के लिए पेश करते हैं-अधिक ज़ोखिम उठाकर अधिक रकम कमाने की इच्छा रखने वाले निवेशकों के लिए, ज्यादा ज़ोखिम न उठाने वाले निवेशकों के लिए. हर तरह के निवेशक के लिए म्युचुअल फ़ंडों के पास कोई न कोई निवेश योजना होती है. यूनिट ट्रस्ट आफ इंडिया भारत का सबसे अनुभवी म्युचुअल फ़ंड है, रिलायंस समूह, कोटक महिंद्रा समूह, फ्रेंकलिन टैंपलटन की म्युचुअल फ़ंड निवेश योजनाओं समेत सैकड़ों म्युचुअल फंड निवेश योजनाएं बाजार में हैं. तो कुल मिलाकर म्युचुअल फ़ंड छोटे शेयरधारियों से पैसा लेकर बाजार में लगाते हैं और जो भी परिणाम होते हैं, अच्छे या बुरे, उन्हे निवेशकों के हवाले कर देते हैं. (क्या आप इस तरह के और लेख पढ़ना चाहेंगे? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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