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भारत का व्यापार घाटा क़ाबू में: रेड्डी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉक्टर वाई वी रेड्डी ने भारत को एक भावी आर्थिक महाशक्ति के रूप में पेश करते हुए कहा है कि देश का व्यापार घाटा अभी क़ाबू में है और देश की आर्थिक वृद्धि की आकांक्षाओं के अनुरूप ही है. लंदन में ‘फ़ॉरेन पॉलिसी सेंटर’ की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता डॉक्टर रेड्डी ने पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार की बात पर ज़ोर तो दिया मगर तेज़ी से उदारीकरण के ख़तरे भी गिनाए. उन्होंने कहा कि उदारीकरण की गति तय करने का मसला हो तो उसके साथ ही बात होगी सतत विकास और अस्थिर वृद्धि दर की भी. भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ने कहा, “अनुभव बताते हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ी से उदारीकरण हो तो उसके बाद वित्तीय अस्थिरता और संकट ही आते हैं और इसकी मार झेलनी पड़ती है देश, सरकार और ग़रीब तबके को.” व्यापार घाटा डॉक्टर रेड्डी का कहना था कि आयात और निर्यात में जिस तरह का संबंध बन गया है उसके बाद अगर आयात बढ़ा है तो निर्यात के मौक़े भी खुले हैं. इस मौक़े पर उन्होंने देश के व्यापार घाटे को क़ाबू में बताते हुए कहा, "ताज़ा अनुभवों को देखते हुए लगता है कि इस समय जो व्यापार घाटा है हम उसे क़ाबू में रख सकते हैं और ये घाटा हमारी आर्थिक वृद्धि की आकाँक्षाओं के अनुरूप ही है." आरबीआई के गवर्नर का कहना था कि भारत में विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार है. उन्होंने कहा कि ये भंडार होना निश्चित ही अनपेक्षित या बड़े झटकों से बचाने में मददगार होता है मगर उदारीकरण से लाभ किसी विकासशील देश को तभी मिलेगा जब ग़ैर वित्तीय क्षेत्र में भी इससे जुड़ी नीतियाँ लागू की जाएँ. विनिमय नीति डॉक्टर रेड्डी ने भारत की विनिमय नीति का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य विनिमय दरों में लगातार उतार चढ़ाव आते रहने को रोकना और विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार बनाए रखना है.
उनके अनुसार, “इस बात पर आम सहमति है कि भारत की विनिमय नीति कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय संकटों के बावजूद समय की कसौटी पर खरी उतरी है.” आरबीआई के गवर्नर ने इस पूरे भाषण के दौरान ज़ोर दिया कि भारत अब 1990 के दशक की शुरुआत की उस स्थिति से कहीं आगे बढ़ चुका है जहाँ उसे सोना तक गिरवी रखना पड़ा था. डॉक्टर रेड्डी के मुताबिक़ उन हालात से सबक लेने का ही नतीजा था कि भारत नब्बे के दशक के मध्य में एशियाई अर्थव्यवस्था में आए संकट का सामना कर सका. |
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