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रिज़र्व बैंक की समीक्षा से उभरती तस्वीर
भारतीय रिज़र्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए ऋण नीति की जो समीक्षा घोषित की है उससे देश की अर्थव्यवस्था के बारे में प्रगति की तस्वीर उभरती है. बैंक ने आर्थिक वृद्धि की दर सात प्रतिशत होने का अनुमान लगाया है जो कि एक तसल्ली की बात है क्योंकि जैसाकि आर्थिक जानकार आलोक पुराणिक मानते हैं कि यह दर कुछ देशों के लिए तो सपने की बात है. इस समीक्षा में बैंक दर के साथ भी कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है और उसे छह प्रतिशत पर ही रखा गया है जिससे उद्योग जगत को ख़ासी निराशा हुई है क्योंकि उद्योग जगत इसमें कमी की उम्मीद कर रहा था. नुक़सान-फ़ायदा आम आदमी को बैंक दर कम होने से इस तरह से फ़ायदा होता है कि बैंक दर जितनी कम होगी लोगों को क़र्ज़ भी उसी दर पर मिलेगा.
लेकिन इस तरह से नुक़सान भी होता है कि जिन लोगों का धन बैंकों में बचत खातों में जमा है उस पर भी ब्याज दर कम हो जाती है. मतलब ये है कि क़र्ज़ देने वाले बैंक और अन्य संस्थाएं रिज़र्व बैंक की बैंक दर के अनुपात में ही अपनी क़र्ज़ दर निर्धारित करते हैं. यानी बैंक दर अगर छह प्रतिशत के स्थान पर पाँच प्रतिशत होती तो बैंकों की क़र्ज़ दर भी उसी अनुपात में कम हो जाती. बैंक दर कम होने से आम लोगों को फ़ायदा होता क्योंकि तमाम बैंक और ब्याज देने वाली अन्य संस्थाएं इसी बैंक दर के अनुपात में क़र्ज़ दर निर्धारित करते हैं. बैंक दर जितनी कम होगी उतनी ही ब्याज दर कम होगी. यूरोपीय देशों में बैंक दरें काफ़ी कम हैं, जैसे ब्रिटेन में साढ़े तीन - चार प्रतिशत के आसपास रहती है जिससे लोग क़र्ज़ लेने में सुविधा महसूस करते हैं और मकान ख़रीदने के लिए क़र्ज़ आसान शर्तों और कम ब्याज पर मिल जाता है. विकास भारत को कितना वक़्त लगेगा यहाँ तक आने में कितना वक़्त लगेगा? आर्थिक जानकार आलोक पुराणिक कहते हैं कि भारत जैसे देश के लिए यह एक काफ़ी तसल्ली की बात है कि बैंक दर छह प्रतिशत पर आ गई है. "कुछ ही साल पहले भारत में बैंक दर और ब्याज दरें 16-17-18 प्रतिशत के आसपास रहती थीं और अब यह छह से आठ प्रतिशत है जिसे एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है." आलोक पुराणिक मानते हैं कि मौजूदा हालात को देखा जाए तो आने वाले पाँच वर्षों में बैंक दर और ब्याज दरें तीन प्रतिशत के आँकड़े पर आने की उम्मीद की जा सकती है और यह मुश्किल भी नहीं नज़र आता है. समीक्षा में आर्थिक वृद्धि दर भी साढ़े छह से सात प्रतिशत तक रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है जो देश की अर्थव्यवस्था की अच्छी हालत का संकेत देता है. वित्तीय घाटा वित्तीय घाटे पर चिंता व्यक्त की गई है जिससे देश की अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ चिंता उभरती है. बैंक का कहना है कि अगर कर राजस्व बढ़ाने के आधार को और बेहतर नहीं किया गया तो राजकोषीय घाटे की समस्या काफ़ी गंभीर हो सकती है.
चिंता की बात ये है कि पिछले पाँच महीनों में ही वित्तीय घाटे में चालीस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. वित्तीय घाटा बढ़ने का मतलब है कि आम आदमी को दी जाने वाली किसी भी तरह की सुविधाओं और सब्सिडी में कमी आएगी और तमाम आधारभूत वस्तुओं की क़ीमतों में भी बढ़ोत्तरी होगी. लेकिन तसल्ली की बात ये है कि मुद्रा स्फीति की दर चार से साढ़े चार प्रतिशत रहने का अनुमान किया गया है जिसका सीधा सा मतलब है कि महंगाई में कुछ कमी की उम्मीद की जा सकती है, अलबत्ता देखने की बात ये है कि महंगाई क्या यह वाक़ई कम होती है. जहाँ तक नक़दी जमा अनुपात यानी सीआरआर का सवाल है तो मौजूदा हालात में उसकी बहुत अहमियत इसलिए नहीं बची है कि बैंकों के पास अब नक़दी की किल्लत नहीं है. सीआरआर दरअसल वह राशि होती है जिसे बैंक अपनी नक़दी जमा में से एक निश्चित राशि निकालकर रिज़र्व बैंक में जमा करते हैं. कुछ साल पहले इसका काफ़ी महत्व था लेकिन अब बैंकों के पास नक़दी की कोई समस्या नहीं है, इसके उलट उनके पास इतनी नक़दी है कि वे क़र्ज़ बाँटने के लिए आतुर हैं. आलोक पुराणिक मानते हैं कि रिज़र्व बैंक की इस समीक्षा से देश की अर्थव्यवस्था के बारे में मिश्रित तस्वीर उभरती है लेकिन उसमें भी क़रीब 70 प्रतिशत सकारात्मक और सिर्फ़ तीस प्रतिशत नकारात्मक संकेत मिलते हैं. |
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