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मंगलवार, 22 अप्रैल, 2008 को 10:01 GMT तक के समाचार
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महाराष्ट्र में शुक्राणुओं की चोरी

शुक्राणु
शुक्राणुओं की चोरी से किसी को फ़ायदा नहीं हुआ
सोना-चांदी-हीरे-जवाहरात की चोरी की बात तो आप सबने सुनी होगी लेकिन महाराष्ट्र के औरंगाबाद में शुक्राणुओं की चोरी की गई है और चोर पकड़ा भी गया है.

शुक्राणुओ की ये चोरी औरंगाबाद के क्रायोबैंक से हुई है जिसे क्रायोसेल इंडिया चलाती है.

पुलिस के अनुसार पकड़ा गया चोर अनिल मोहिते क्रायोबैंक की लेबोरेटरी में काम करने सुनिल मोहिते का भाई है.

अनिल को मुंबई में उस समय गिरफ्तार किया गया जब वो ये शुक्राणु मुंबई के एक डॉक्टर को बेचने की कोशिश कर रहा था.

औरंगाबाद में इस मामले की जांच कर रहे अधिकारी पी एस बोलकर ने बीबीसी को बताया कि क्रायोबैंक के अधिकारियों ने हफ्ते भर पहले उनसे शिकायत की थी कि उनके शुक्राणु बैंक से चोरी हो रही है.

पुलिस ने छानबीन शुरु की और सुनिल मोहिते को पकड़ कर पूछताछ की जिसके बाद यह मामला प्रकाश में आया है.

पुलिस के अनुसार अनिल और सुनिल ने मिलकर ये शुक्राणु चुराए और बेचने की कोशिश की लेकिन शायद उन्हें ये नहीं पता था कि ये इतने मंहगे नहीं है.

इन चोरों ने शुक्राणुओं के क़रीब 100 नमूने चुराए थे जिसकी क़ीमत 25 से 40 हज़ार आंकी गई. हालांकि कुछ डॉक्टरों के अनुसार शुक्राणुओं की क़ीमत प्रति शुक्राणु एक हज़ार रुपए तक भी हो सकती है.

क्रायोबैंक के प्रमुख सूर्यकांत हयातनगरकर कहते हैं कि पिछले एक साल से उनके बैंक में चोरियां हो रही थीं और उन्हें शक था.

चोरी

 इसमें तो बैंक के कर्मचारी मिले हुए हैं. ये हुआ कि इन कर्मचारियों को वो सभी डॉक्टर जानते हैं जो इस बैंक से स्पर्म लेते हैं. इन्हें शुक्राणुओं को एक जगह से दूसरी जगह भेजने की प्रक्रिया मालूम है. इसलिए उन्हें दिक्कत नहीं हुई चुराने में
पीएस बोलकर

शुक्राणुओं को संरक्षित रखना मुश्किल काम है तो फिर ये चोरी हुई कैसे. पुलिस अधिकारी पीएस बोलकर बताते हैं," देखिए इसमें तो बैंक के कर्मचारी मिले हुए हैं. ये हुआ कि इन कर्मचारियों को वो सभी डॉक्टर जानते हैं जो इस बैंक से स्पर्म लेते हैं. इन्हें शुक्राणुओं को एक जगह से दूसरी जगह भेजने की प्रक्रिया मालूम है. इसलिए उन्हें दिक्कत नहीं हुई चुराने में. "

औरंगाबाद में शुक्राणुओं के बैंक क्रायोबैंक से ये चोरी हुई हैं. क्रायोबैंक के मालिक सूर्यकांत हयातनगरकर बताते हैं कि इन शुक्राणुओं को गैस सिलेंडर जैसे बड़े डिब्बों में द्रव नाइट्रोजन के साथ रखा जाता है और और इसका एक नियत तापमान बनाना पड़ता है.

इसके लिए एक विशेष किस्म का थर्मस होता है जिसे ट्रायोकैन कहा जाता है.

पेशे से पैथोलॉजिस्ट हयातनगरकर के अनुसार ट्रायोकैन में शुक्राणुओं को द्रव नाइट्रोजन के साथ रखा जाता है और इसका तापमान शून्य से 196 डिग्री कम रखा जाता है. तापमान बढ़ने पर शुक्राणु ख़राब हो सकते हैं.

लेकिन इतना कम तापमान बरकरार कैसे रखा जाता है. हयातनगरकर के अनुसार थर्मस में से द्रव नाइट्रोजन धीरे धीरे उड़ता है जिससे तापमान कम बनाए रखा जाता है.

11 लीटर के एक थर्मस में कम से कम 20 दिन तक द्रव नाइट्रोजन के ज़रिए कम तापमान बना रहता है और शुक्राणु संरक्षित रह सकते हैं जबकि 55 लीटर के थर्मस में 110 दिन तक शुक्राणु सुरक्षित रहते हैं.

डॉक्टरों भी इस तरह की चोरी से थोड़े अचंभे में हैं क्योंकि आम तौर पर कृत्रिम गर्भाधान करवाने वाले सभी क्लिनिकों के पास अपने शुक्राणु बैंक होते हैं और वो किसी बाहरी व्यक्ति से इनकी ख़रीद फ़रोख्त नहीं करते.

हयातनगरकर कहते हैं कि शुक्राणुओं की ख़रीद फ़रोख्त के क्षेत्र में कोई क़ानून न होना भी चोरी की वजह है.

भारत में इस संबंध में कोई क़ानून नहीं है जिसका मतलब है कि कोई भी डॉक्टर किसी से भी शुक्राणु खरीद सकता है. इस घटना से ये संभव नहीं है कि क़ानून बन जाएं लेकिन इतना ज़रुर है कि शुक्राणुओं की इस चोरी में क्रायोबैंक को नुकसान हो गया है क्योंकि अब चोरी वाले शुक्राणु उनके शायद किसी काम न आएं.

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