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सोमवार, 05 मई, 2008 को 11:54 GMT तक के समाचार
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किसानों की आत्महत्या में कमी नहीं

किसान
विदर्भ के किसानों में आत्महत्या की संख्या बढ़ी है
महाराष्ट्र में सरकार की कई राहत योजनाओं के बावजूद किसानों में आत्महत्या की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है.

रिपोर्ट में सरकारी योजनाओं को लागू करने में कमी और सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय को इसके लिए ज़िम्मेदार बताया गया है. हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के किसानों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या की है.

आत्महत्या की मुख्य वजह कर्ज़ ना चुका पाना है. केंद्र और राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए 40 अरब रुपए के पैकेज का वादा किया था. आकलन ये है कि हर साल भारत में 10 हज़ार किसान आत्महत्या करते हैं.

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया है कि राहत योजनाओं को लागू करने में गंभीर कमियाँ थी.

कमियाँ

रिपोर्ट में कहा गया है- राहत पैकेज में कई तरह की कमियाँ महसूस की गई. राहत कोष का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुआ. इस पैकेज के तहत किसानों की चिंता के कई अहम पक्षों पर ध्यान नहीं दिया गया. सिर्फ़ विदर्भ के किसानों की चिंता कम होने से विश्वास का माहौल पैदा नहीं होता.

 राहत पैकेज में कई तरह की कमियाँ महसूस की गई. राहत कोष का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुआ. इस पैकेज के तहत किसानों की चिंता के कई अहम पक्षों पर ध्यान नहीं दिया गया. सिर्फ़ विदर्भ के किसानों की चिंता कम होने से विश्वास का माहौल पैदा नहीं होता
रिपोर्ट

वर्ष 2005 में महाराष्ट्र सरकार ने किसानों में बढ़ती आत्महत्या की संख्या को देखते हुए एक राहत पैकेज की घोषणा की थी. उस साल 455 किसानों ने आत्महत्या की थी. जबकि एक साल पहले ये संख्या 146 थी.

वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने विदर्भ क्षेत्र के सबसे ज़्यादा प्रभावित छह ज़िलों और चार अन्य राज्यों के 25 प्रभावित ज़िलों के लिए विशेष पुनर्वास पैकेज की घोषणा की थी.

किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की स्थिति सबसे बुरी रही है. आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़ अप्रैल 2006 से मार्च 2007 के बीच विदर्भ क्षेत्र में किसानों की मौत की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है और ये बढ़कर 1414 हो गई है.

आँकड़े

रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2007-08 के पहले छह महीनों में ये संख्या 600 है. आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2006 में 13 लाख से साढ़े 17 लाख किसान मानसिक रूप से परेशान थे. इनमें से चार लाख 34 हज़ार किसानों को ज़्यादा पीड़ित किसानों की सूची में रखा गया था.

कर्ज़ से प्रभावित हैं किसान

रिपोर्ट के मुताबिक़ राहत पैकेज लागू करने वाली एजेंसियों ने इन आँकड़ों के बारे में जानने की ज़रूरत नहीं महसूस की और इसके कारण राहत कार्यों को लागू करने में काफ़ी कमियाँ रही.

रिपोर्ट में सरकार की इस बात के लिए आलोचना की गई है कि सरकार ने किसानों को शिक्षित करने के लिए कोष जारी नहीं किया ताकि किसानों को उनके अधिकारों के बारे में बताया जा सके.

क़रीब 75 प्रतिशत किसान ग़ैर क़ानूनी रूप से कर्ज़ देने पर लगी पाबंदी के बारे में जानते तक नहीं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस तरह के कर्ज़ पर रोक के बावजूद कई मामलों में किसान ज़्यादा ब्याज़ भी देते हैं.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई बैंक ज़्यादा ब्याज़ दर की मांग करते हैं, जिनकी उन्हें अनुमति तक नहीं. किसानों की आत्महत्या के मामले में सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र.

विदर्भमरने को मजबूर किसान
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किसानआत्महत्याएँ जारी
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कर्ज़ की मार
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