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हज़ारों टन आयातित गेहूँ नष्ट किया जाएगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बढ़ती मंहगाई और खाद्य संकट के बीच महाराष्ट्र सरकार का यह फ़ैसला सबको चौंका सकता है कि वो 32000 टन गेहूँ नष्ट करेगी. सरकार का कहना है कि वो बेबस है और 32000 टन गेहूँ नष्ट करना ही पड़ेगा क्योंकि ये अब मनुष्यों के खाने लायक नहीं है. महाराष्ट्र सरकार ने पिछले साल ऑस्ट्रेलिया से क़रीब 1300 रुपए प्रति टन के हिसाब से लाखों टन लाल गेहूँ आयात किया था. जब से ये लाल गेंहू आया इसकी गुणवत्ता के बारे में सवाल उठाए जा रहे थे. न केवल विशेषज्ञों ने बल्कि महाराष्ट्र के लोगों ने भी इस लाल गेहूँ के ख़िलाफ़ शिकायत की और मजबूरन सरकार को इसकी जांच करवानी पड़ी. जब इस गेहूँ के नमूनों की जांच हुई तो पाया गया कि इसका एक हिस्सा लोगों के खाने लायक ही नहीं है. सरकार की किरकिरी हुई और सरकार ने पिछले साल नवंबर में इस गेहूँ की बिक्री बंद करने की घोषणा कर दी. अब सरकार ने नोटिस जारी कर कहा है कि इस गेहूँ का एक हिस्सा लोगों के खाने लायक है. लेकिन अगर यह हिस्सा लोगों के खाने लायक है तो इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सरकारी योजनाओं के तहत क्यों नहीं वितरित किया जा रहा है. इसका जवाब सरकार नहीं दे रही है. महाराष्ट्र के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सुनील तत्करे कहते हैं, "‘देखिए 18000 टन लोगों के खाने के लिए ठीक है लेकिन हमने अब तय किया है कि इसको भी नष्ट कर देंगे और जो जानवरों मसलन मुर्गियों के खाने योग्य है वो भी नष्ट कर दिया जाएगा. लेकिन मैं ये कहना चाहूंगा कि इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं है. गेहूँ का आयात केंद्र सरकार करती है और वही गेहूँ को हर जगह बेचती है. हमारे पास जो गेहूँ आया वो ख़राब था तो हमने इसको नष्ट करने का फ़ैसला किया." ख़राब गेहूँ वैसे केंद्र में भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार कृषि मंत्री है और गेहूँ के आयात संबंधी फ़ैसले में उनकी भूमिका ज़रुर होगी. इस बारे में पूछने पर सुनील तत्करे नाराज़ होकर कहते हैं, ‘मैं तो यही कह सकता हूं कि गेहूँ आयात करने के मामले में कई मंत्रालय मिलकर फ़ैसला करते हैं. आपको यह सवाल केंद्र सरकार के मंत्रियों से करना चाहिए क्योंकि आयात वही करते हैं और पूरे देश में भेजते हैं.’ उधर राज्य की विपक्षी पार्टी के नेता नितिन गडकरी कहते हैं कि आयात किया गया गेहूँ ख़राब तो है और इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार दोनों ज़िम्मेदार है. वे कहते हैं, "ये तो किसानों के साथ घोर अन्याय है. केंद्र ने सूअरों के खाने वाला गेहूँ विदेशों से आयात किया और वो भी इतना मंहगा. एनसीपी सरकार को समझ नहीं आ रहा है अब इतना ख़राब गेहूँ का क्या करें. मेरा सुझाव है कि शरद पवार ज़िंदाबाद के नारे लगाकर यह गेहूँ समुद्र में फेंक देना चाहिए." यह पूरे देश के लिए ही विडंबना कही जाएगी जहां देश के किसानों का गेहूँ कम दाम में ख़रीदा जा रहा है वहीं विदेशों के किसानों को गेहूँ के अधिक दाम दिए जा रहे हैं और वो भी ख़राब गेंहूं के. और इसे उस राज्य में बेचा जा रहा है जहां का किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें दाना पानी, हर किसी की यही कहानी11 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस भारत पर खाद्य संकट का ख़तरा?09 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस महंगाई के मुद्दे पर संसद में हंगामा15 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस दक्षिण एशिया में खाद्यान्न संकट09 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस ...ताकि उजागर न हो सके कालाहांडी का सच09 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस ऑस्ट्रेलियाई गेहूँ पर विवाद08 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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