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शुक्रवार, 11 अप्रैल, 2008 को 14:34 GMT तक के समाचार
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दाना पानी, हर किसी की यही कहानी

 खेत में किसान
भारत में चावल के निर्यात पर आंशिक रोक लगा दी गई है
कैरेबियाई देश हेती में जो कुछ हुआ, वो सबके सामने है. वहीं की गुस्साई जनता खाने की बढ़ती क़ीमत पर अपनी सरकार से जवाब मांग रही है. ऐसे नज़ारे कुछ अफ़्रीकी देशों में भी देखे गए हैं.

पिछले 25 सालों में दुनिया भर का अनाज भंडार सबसे निचले स्तर पर है और ख़ाने की क़ीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं.

दुनिया भर की सरकारें चिंतित हैं- कहीं अनाज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं तो कहीं इनके आयात पर से प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं.

भारत में भी सरकार बढ़ती महँगाई की मार झेल रही है. उसने भी चावल के निर्यात पर आंशिक रोक लगा दी है और कई खाद्य सामग्रियों के आयात शुल्क घटा दिए गए हैं. पर चिंता की बात ये है कि अभी भी अनाजों की क़ीमतें घटने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.

महंगाई दर

साल 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया था, और आज यूपीए सरकार का भी सारा ध्यान किसानों, खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति पर टिका हुआ है.

मनमोहन सिंह ने कहा है कि खाद्यान्न की कमी और उनकी क़ीमतों में वृद्धि निकट भविष्य में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है.

 खाद्यानों की कमी और उनकी क़ीमतों में वृद्धि निकट भविष्य में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है
डा. मनमोहन सिंह, भारतीय प्रधानमंत्री

उन्होंने कहा कि “तेज़ी से बढ़ती खाद्यान्न की क़ीमतों से ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम धीमा पड़ सकता है. आर्थिक विकास और रोज़गार के अवसर कम हो सकते हैं. इस प्रक्रिया का विश्व अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, और विकासशील देशों को तो इसका काफ़ी नुक़सान झेलना पड़ेगा.”

अब अगर मौजूदा समस्या की जड़ टटोलने की कोशिश करें तो जलवायु परिवर्तन, जैविक ईंधन या बायोफ़्यूल के लिए खाद्यानों का इस्तेमाल, अपनी ज़रूरत जितना उत्पादन न कर पाना और खान-पान की बदलती आदतें जैसे कारण हमारे सामने आएंगे.

कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं भारत के खाद्यान्न की औसतन वार्षिक पैदावार में बढ़ोत्तरी करीब 70 लाख टन होनी चाहिए, लेकिन 1987 के बाद ये वृद्धि 20 लाख टन से ज़्यादा की नहीं हुई है. वे कहते हैं कि ये काफ़ी गंभीर मसला है.

देविंदर शर्मा कहते हैं कि भारत में अभी अनाज की कोई कमी नहीं है, लेकिन भविष्य में खाद्यान्न की स्थिति से जु़ड़े कई गंभीर सवाल हमारे सामने होंगे.

यानी जितनी पैदावार होनी चाहिए वो नहीं हो रही है. उस पर मक्का और सोया जैसी फ़सलों का बायोफ़्यूल में इस्तेमाल समस्या को और भी गंभीर बना रहा है.

ईथनॉल

साल 2020 तक चीन अपना ईथनॉल उत्पादन 15 अरब लीटर करना चाहता है. वहीं भारत सरकार ने फ़ैसला किया है कि अगले साल से तेल कंपनियो को पेट्रोल में 10 प्रतिशत ईथनॉल मिलाकर बेचना होगा.

यानी भारत में भी खेतों को बायोफ़्यूल उगाने के लिए खाली किया जाएगा, जबकि उसकी मौजूदा खाद्य ज़रूरतें पूरी नहीं हो रहीं हैं.

अमरीका में भुट्टे की फ़सल
अमरीका सहित अन्य देशों में खेतों को बायोफ़्यूल उगाने के लिए खाली किया जा रहा है

ये तब है जब दुनिया की एक तिहाई भूखी आबादी भारत में रहती है. तक़रीबन 32 करोड़ लोग खाली पेट सोते हैं, वो इसलिए कि उनके पास राशन में बिकने वाले चार-पांच किलो गेहूं को भी खरीदने के लिए पैसे नहीं है. उनके लिए ये क़ीमतें भी भारी हैं.

कृषि विशेषज्ञ और जीन कैम्पेन की सुमन सहाय पानी के संरक्षण और किसानों को सही बाज़ार मूल्य देने पर ज़ोर देती हैं.

भारत में खाने-पीने की चीज़ों के बढ़ते दामों के पीछे ज़रूरत और आपूर्ति का समन्वय न होना अकेला कारण नहीं है. तेल की क़ीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल हो गई हैं, और ऐसे में खाद्य और कीटनाशक वस्तुओं का उत्पादन करना महंगा हुआ है, जो कि कृषि उत्पाद की क़ीमत बढ़ा देता है.

भारत धान और गेहूं की 90-95 प्रतिशत ज़रूरत ख़ुद ही पूरी कर लेता है, और इसका आयात बहुत थोड़ी मात्रा में होता है, इसलिए भारत पर इनकी कीमत बढ़ने का असर उतना नहीं होता है.

पर ये भी एक तथ्य है कि अच्छे उत्पादन के बावजूद भारत पिछले दो सालों से गेहूं का आयात कर रहा है. इसके पीछे वही पुरानी समस्या है -- न्यूनतम समर्थन मूल्य बहुत कम होना और निजी व्यापारियों का सरकार से बेहतर दामों पर माल ख़रीदना.

कृषि सुधार

देविंदर शर्मा कृषि क्षेत्र में सुधार के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि भारत को अपने किसानो को न्यूनतम मेहनताना देना होगा, क्योंकि देश की आर्थिक उन्नति में उनका भी हाथ है.

देविंदर शर्मा कहते हैं कि भारत को अपने बाज़ार विदेशी खाद्य उत्पादों के लिए नहीं खोलने चाहिए, और महंगाई दर में वृद्धि के बहाने आयात शुल्कों में जो कमी की गई है, वो देश के हित में नहीं है.

देविंदर शर्मा कहते हैं कि खाद्य वस्तुओं को आयात करना बेरोज़गारी आयात करने जैसा है. वो कहते हैं कि भारत को परंपरागत खेती की तरफ वापस जाना होगा, रासायनिक खादो का धीरे-धीरे बाहर करना होगा ताकि ज़मीन की उर्वरता कायम रखी जा सके.

हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले एमएस स्वामीनाथन कहते हैं कि किसानों के लिए जब न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होता है और जब तक फ़सल पैदा होती है, क़ीमतें बहुत बढ़ जाती है. इसमें बदलाव लाने की ज़रूरत है.

खेत में किसान
कृषि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि किसान अब खेती नहीं करना चाहते हैं

कुछ कृषि वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि जब तक स्थिति नहीं सुधरती, लोकप्रिय चुनावी वादे जैसे दो रुपए किलो चावल देना आदि को लागू किया जाना चाहिए.

दुनिया भर में कृषि नीति तैयार करने वालों को जलवायु परिवर्तन से बारिश के कम-ज़्यादा या बेमौसम होने, सूखे, तपमान गिरने या बढ़ने जैसी समस्याओं को भी ध्यान में रखना है. फिर मीट और दूध के बढ़ते उपयोग और इसके स्रोतों पर बढ़ते दबाव पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.

यानी उपाय जल्द से जल्द ढूंढ़ना ज़रूरी है, क्योंकि हालात ऐसे बन रहे हैं कि किसान किसानी नहीं करना चाहते.

सुमन सहाय कहती हैं कि कल अगर किसान हाथ खड़े कर दे कि वो खेती नहीं करना चाहता, तो हम और आप क्या खाएंगे. वे कहती हैं कि दिल्ली और मुंबई में बैठकर खाद्यान्न पर बहस करना आसान है, लेकिन ज़मीनी हालात बेहद चिंताजनक हैं.

यानि सरकार को समझना है कि देश की धरती सोना तभी उगलेगी जब किसान के लिए खेती फ़ायदे का सौदा बनेगी.

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