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किसानों को अमरीकी दबाव की चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय किसानों के माथे पर पसीने की बूंदें साफ झलक रही हैं. जिनीवा में 29 जून से होने वाली बैठक में विश्व व्यापार संगठन के 40 व्यापार मंत्री मिल रहे हैं. वे तय करने वाले हैं कि कृषि क्षेत्र में कितनी सब्सिडी पर सहमति बने और कैसा कृषि शुल्क लगाया जाए और यही भारतीय किसानों की चिंता का कारण है. उनके पास आने वाली सूचनाओं से उनकी चिंता और बढ़ गई है. ऐसे संकेत हैं कि डब्ल्यूटीओ की विशेष सूची में अमरीका केवल पाँच चीज़ों को शामिल करना चाहता है. अमरीका के लिए ये काफ़ी है क्योंकि वहाँ केवल 30 फसलें होती है जिनमें 10 व्यवसायिक रूप से अहम हैं. जबकि भारत में छह करोड़ 50 लाख किसान हैं और 260 फसलें. तो पाँच फसलों को विशेष सूची में डालना मतलब किसानों को खेती छोड़ने पर मजबूर करने से कम नहीं होगा. देश के सबसे बड़े कृषि संगठन भारतीय किसान यूनियन के एक नेता युधवीर सिंह कहते हैं, ‘‘आज डब्ल्यूटीओ में जो नीतियाँ बन रही हैं वह यूरोपीय और अमरीकी किसानों को देखकर बनाई जा रही हैं. हमारा यह मानना है कि डब्ल्यूटीओं में खेती को रखा गया तो निश्चित तौर पर हिंदुस्तान में किसान का वजूद ज़्यादा दिन रहने वाला नहीं है. आने वाले 10 वर्ष में हिंदुस्तान में जो किसान हैं वे खेतिहर मज़दूर बनकर रह जाएंगे.’’ सच्चाई वहीं खाद्य और व्यापार नीति के जानकार देवेंदर शर्मा का कहना है कि विश्व व्यापार संघ के विकासशील देशों के लिए मुनाफ़े का सौदा बताने वालों की सच्चाई सामने आ रही है. इन आँकड़ों के अनुसार व्यापार उदारीकरण से आठ अरब 32 करोड़ के फायदे का अनुमान पेश किया गया था. अब हांगकांग की 2005 बैठक के बाद इसे घटाकर 96 अरब डॉलर कर दिया गया और इसमें विकासशील देशों की हिस्सेदारी महज़ 16 अरब डॉलर रखी गई. वे कहते हैं, "अगर विशेष सूची और संवेदनशील उत्पादों को शामिल करें तो विकासशील देशों का फायदा केवल छह अरब 70 करोड़ डॉलर रह जाएगा जिसे 110 देशों के बीच बाँटा जाएगा." देवेंदर शर्मा का आरोप है कि भारत अमरीकी दबाव में काम कर रहा है, ‘‘कमलनाथ अमरीका से आए हैं और अब जो संकेत दिए जा रहे हैं उसी से हमें डर है कि यह एक नपा तुला समझौता हो चुका है."
देवेंदर शर्मा तो शशि थरूर की दावेदारी को भी इससे जोड़कर देखते हैं. "हमारे देश के शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र का महासचिव पद का दावेदार बनाया गया है. यह भी एक समझौता है और इसके बदले भारत को कृषि क्षेत्र खोलने की बात हो रही है." वे कहते हैं, "इसलिए हमें डर है कि ये जो वार्ता शुरू होने वाली है उसके अंतर्गत कमलनाथ घुटने टेक कर आएंगे." आत्महत्याएँ डब्ल्यूटीओ के आने से भारतीय कृषि विश्व व्यापार से जुड़ गया है और किसानों की आत्महत्याएं भी लगातार हो रही हैं. विदर्भ के किसान और शेतकारी संगठन के नेता विजय जवांधिया कहते हैं, ‘‘अमरीका में चुनाव है इसलिए जॉर्ज बुश सब्सीडी कम करके किसानों को नाराज करना नहीं चाहते. दो प्रतिशत किसानों के लिए वे इतने जागरुक हैं तो हमारे यहाँ 70 प्रतिशत किसान आज खेती पर अपनी ज़िंदगी जीते हैं. उनकी हम कितनी उपेक्षा कर रहे हैं." वे कहते हैं, "हमारी भारत सरकार से अपेक्षा यही है कि यहाँ पर सभी कृषि उत्पादनों पर आयात कर बढ़ाना चाहिए. उनका गणित है कि दुनिया के बाजारों में दाम बढ़ेंगे और उसका लाभ हमको मिलेगा. जो दाम बढ़ने का उनका गणित है उतने दाम वे हमारे यहाँ पर समर्थन मूल्य घोषित करके किसानों को क्यों नहीं देते.’’ किसानों का कहना है कि अगर भारत सरकार उनकी माँगे नहीं मानती तो वे व्यापक आंदोलन छेड़ेंगे क्योंकि ऐसा ही चला तो किसानों को कृषि छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें 'डब्ल्यूटीओ में भारत का रूख़ ग़लत'19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस बासमती उगाने वाले बेबस और बेचैन 31 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस आंध्र के किसान अफ्रीका की ओर29 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस बिहार में अभिशप्त कृषि और किसान07 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'कृषि और रोज़गार हमारी प्राथमिकता हैं'17 जून, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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