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अमरनाथ मंदिर से जुड़े विवाद की जड़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य में हिमालय की गुफ़ा में स्थित भगवान भोले शंकर के अमरनाथ मंदिर तक भारत के कोने-कोने से श्रद्धालु सदियों से पहुँचते रहे हैं. अमरनाथ मंदिर जाने वाले यात्रियों की सुविधाओं का ख़्याल रखने के लिए राज्य विधानसभा ने वर्ष 2000 में एक क़ानून बनाकर अमरनाथ मंदिर बोर्ड का गठन किया था. उस समय भी पर्यावरणविदों को इस क़दम पर एतराज़ था लेकिन उन्होंने या किसी राजनीतिक संगठन ने सरकार के इस फ़ैसले का विरोध नहीं किया. लेकिन पाँच साल पहले जब भारतीय सेना के अवकाशप्राप्त उपप्रमुख जनरल एसके सिन्हा को राज्य का राज्यपाल बनाया गया तभी से बोर्ड की चर्चा नकारात्मक कारणों से होने लगी. हर साल यह तीर्थयात्रा दो सप्ताह से लेकर एक महीने के बीच पूरी हो जाती थी. लेकिन राज्यपाल होने के नाते अमरनाथ मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष जनरल सिन्हा ने इस यात्रा को पूरे दो महीने तक चलाने का फ़ैसला किया. इसको लेकर जनरल सिन्हा का तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद से टकराव भी हुआ. सईद का कहना था कि इतने लंबे समय तक यात्रा की व्यवस्था देख पाना प्रशासन के लिए महँगा साबित होगा. लेकिन जनरल सिन्हा ने उनकी एक न मानी और अपनी ही की. समानांतर सत्ता का सवाल
कुछ समय बाद मंदिर बोर्ड ने विधानसभा के सदस्यों के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया. बोर्ड के अध्यक्ष जनरल सिन्हा ने दलील दी कि राज्य का राज्यपाल होने के नाते वे विधानसभा के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. इससे राजनीतिक हलकों और आम लोगों के बीच यह छवि बनी कि अमरनाथ मंदिर बोर्ड के नाम पर राज्यपाल एक समानांतर सत्ता चला रहे हैं. लोगों के इस संदेह को तब और भी बल मिला जब जनरल सिन्हा ने बलताल से लेकर पहलगाम तक के इलाक़े की देखरेख के लिए अमरनाथ विकास प्राधिकार बनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार के सामने रखा. इस शक़ और संदेह के महौल के बीच ही राज्य मंत्रिमंडल ने क़रीब सौ एकड़ वनभूमि अमरनाथ मंदिर बोर्ड को देने का आदेश दे दिया. ये ज़मीन इससे लोगों में आक्रोश फैल गया. पर्यावरणविदों ने इसे 'पर्यवरण के लेहाज़ से एक आपदा' क़रार दिया. आम लोगों, बुद्धिजीवियों और अलगाववादी समूहों ने इसे 'घाटी में ग़ैर-कश्मीरी हिंदुओं को बसाकर मुस्लिमों को अल्पसंख्यक बनाने की साज़िश' का हिस्सा बताया. संदेह का बढ़ता दायरा
जब दो मंत्रियों, जिन्होंने सरकार में इस फ़ैसले की हिमायत की थी, सार्वजनिक तौर पर इसके ख़िलाफ़ बोले तो लोगों की इस तरह की आशंकाएँ और भी गहरी हो गईं. राज्य के उपमुख्यमंत्री मुज़फ़्फर बेग ने तो यहाँ तक कह दिया कि उन पर और उनके जैसी राय रखने वाले दूसरे मंत्रियों पर कांग्रेस पार्टी के हिंदू मंत्रियों ने 'ज़मीन हस्तांतरण पर सहमत होने के लिए दबाब' डाला था. उन्होंने ऐसे दो मंत्रियों का नाम भी लिया और कहा कि उन लोगों ने धमकी दी थी कि यदि इस प्रस्ताव पर वे सहमत नहीं होते तो वे भी 'मुग़ल मार्ग परियोजना' के लिए वनभूमि देने में रोड़ा अटका देंगे. मुग़ल मार्ग परियोजना कश्मीर घाटी को जम्मू क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाक़ों को सड़क मार्ग से जोड़ने वाली योजना है जो श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग का विकल्प बनेगी. बेग राज्य सरकार में शामिल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेता हैं और उनकी पार्टी ने अमरनाथ मंदिर बोर्ड को ज़मीन देने का फ़ैसला वापस लेने की माँग की है. 'विशेष दर्जा - एक दिखावा?'
विवाद को बेहतर तरीक़े से समझने के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि कश्मीर के लोग राज्य में ज़मीन के किसी भी तरह के हस्तांतरण को लेकर बहुत ज़्यादा संवेदनशील हैं. पिछले छह दशकों के घटनाक्रम ने उनमें अपनी पहचान को लेकर असुरक्षा की भावना भर दी है. जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत में विशेष दर्जा मिला हुआ है. तकनीकी रूप से यह दर्जा बना हुआ है. लेकिन भारतीय संविधान में इस राज्य को जितनी स्वायत्तता की गारंटी की गई थी, उसमें पिछले पाँच दशकों में कमी आई है. राज्य को दी गई स्वायत्तता के नाम-मात्र रह गई है. कश्मीर के लोगों या ऐसा कहें कि बहुसंख्यक मुसलमानों को लगता है कि अपनी पहचान बचाए रखने का अकेला ज़रिया यही है कि ज़मीन पर नियंत्रण बनाया रखा जाए. मौजूदा स्थायी निवास क़ानून के तहत ग़ैर-कश्मीरियों को राज्य में ज़मीन ख़रीदने का अधिकार नहीं है. ग़रीबी पर पहचान भारी
एक ज़माने में कश्मीर के लोकप्रिय नेता रहे शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला को इलाक़े के लोग आज़ भूमि अनुदान क़ानून के लिए कोसते हैं. इस क़ानून के तहत राज्य सरकार उद्योग-धंधे लगाने के लिए ग़ैर-कश्मीरियों को लीज़ पर ज़मीन दे सकती है. राज्य सरकार ने वर्ष 2006 में विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल गुलमर्ग में होटल और आवास बनाने के लिए ग़ैर-कश्मीरी निवेशकों को भी बोली लगाने का मौक़ा देने का फ़ैसला किया था. लेकिन राज्य के लोगों के कड़े विरोध के बाद इस फ़ैसले को वापस ले लिया गया. दुनिया के हर कोने में लोग आर्थिक विकास के लिए विदेशी निवेश का दिल खोलकर स्वागत कर रहे हैं लेकिन कश्मीर के लोगों ने पहचान बचाए रखने के लिए ग़रीब बने रहना क़बूल किया है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे एक ऐसी संस्था को ज़मीन देने का विरोध कर रहे हैं जो राज्य विधानसभा के नियंत्रण से भी बाहर है. |
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