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वादी की फ़िज़ाओं में ये कैसा बदलाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कश्मीर सत्रह साल बाद जा रहा था. पहले और आज.. कितना अंतर है.. सैनिक छावनी जैसे श्रीनगर हवाई अड्डे से होटल पहुँचने तक मैं बाहर सड़कों पर परिवर्तन ढूँढ रहा था. पहले सड़कों और गलियों के नुक्कड़ पर जवान लड़कों के झुंड खड़े दिखते थे. टूरिस्टों को अपनी ओर खींचने के लिए या कुछ तो यूँ ही धूप सेंकने के वास्ते खड़े मिलते थे. अब उन नुक्कड़ों पर पुलिस और सीआरपीएफ़ के जवान दिख रहे थे. लड़के ना जाने कहाँ गए होंगे. ऐसा तो कहीं नहीं लग रहा था कि इन सत्रह सालों में रोज़गार इतना बढ गया होगा कि सब काम पर लग गए होंगे. बहुत पानी बहा है पुल के नीचे से... अभी समझने में देर लगेगी. यही सोचते सोचते, सामान होटल में पटका और अल्ताफ़ हुसैन के घर चले गए. बैठ कर तय कर रहे थे भूकंप की पहली वार्षिकी का कवरेज कैसे हो. फिर पटाखों जैसी आवाज़ें सुनाई देने लगी. कमरे में धड़धड़ाते हुए घुसे एक परिचित ने बताया आत्मघाती हमला हो गया है. करीब पांच सौ गज दूर. हम रिकॉर्डर लेकर उस ओर भागे. अल्ताफ़ ने कहा बीबीसी का माइक हाथ में ले लें. इससे कोई दूर से भी पहचान लेगा कि आप प्रेस वाले हैं. एनकाउंटर बडशा चौक में एनकाउंटर चल रहा था. दुकानें धड़ाधड़ बंद हो रही थीं. सुरक्षाबलों की गाड़ियाँ चारों तरफ़ से पहुँच रही थीं और प्रेस फ़ोटोग्राफ़र ज़मीन पर रेंगते हुए गोलियों से बचते तस्वीरें खींच रहे थे.
घटनास्थल से ख़बर फ़ाइल हो रही थी. एक कश्मीरी दुकानदार ने कुछ तंज़ से कहा.. वेलकम टू श्रीनगर. दूसरे एक बुज़ुर्ग ने गर्दन झटक कर कहा चलो अब यह चलेगा काफ़ी देर तक. फ़िदाइन अटैक है ना.. हम निकलने लगे तो बगल वाली गली में ही लाल चौक के पास सारी दुकानें खुली थीं. जैसा अंग्रेज़ी में कहते हैं 'बिजनेस ऐज यूजुअल'. दोपहर में काम से शहर में निकले तो सब कुछ सामान्य. एनकांउटर चौबीस घंटों तक चला. तब पहली बार 1989 की वो दोपहर याद आयी जब तंगमर्ग से गुज़र रहे थे और वहाँ एक देसी बम फटा था. एक व्यक्ति घायल हुआ था और जैसे पूरी वादी में उस धमाके की गूँज थी. आते जाते लोग एहतियात से रहने को कहते. वो चरमपंथी हिंसा की शुरुआत थी. आज सब उसके आदि हैं. मगर हर दो सौ मीटर पर खड़े सुरक्षाकर्मियों को देख कर नहीं लगता कि वो इसके आदि हैं. उनके चेहरे पर आशंका ज़्यादा है या सतर्कता, कहना मुश्किल है. ख़तरा किसी भी गाड़ी में मौत सवार हो सकती है. वो हर गाड़ी को रोकते हैं, चेक करते हैं. श्रीनगर से सीमावर्ती उड़ी क्षेत्र के सफ़र के दौरान एक सैनिक छावनी के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था. नॉट अलर्ट नॉट अलाइव. यानी सतर्क नहीं रहोगे तो जिंदा भी नहीं रहोगे. कश्मीर में जैसे यह चेतावनी सब पर लागू होती है. वादी में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और सुरक्षाबल दूसरा बड़ा समुदाय है. कैसा रिश्ता है इन दो समुदायों के बीच.... एक कश्मीरी ने कहा डरे हुए लोग डराए हुए लोगों की हिफ़ाजत कर रहे हैं.
आर्मी वालों से पूछो तो कहेंगे डर किस बात का... हाँ तैयार रहते हैं. मशीनगनों से लैस बख़्तरबंद गाड़ियों में घूमते हुए, सड़कों के किनारे बम तलाश करते हुए. खेतों और जंगलों में किसी भी संदिग्ध हरकत को अंधेरे से अलग करते हुए, वो वादी के चप्पे चप्पे पर तैयार हैं. उड़ी से लौटते वक्त चंदनवाड़ी के पास एक बड़ा सा पनबिजली घर दिखाई दिया. हमारा ड्राइवर जो बीच बीच में गाइड की भूमिका अपना लेता था उसने सहजता से कहा 450 मेगावाट का है. इसकी बिजली बाहर जाती है. यह इंडिया ने बनाया है. अपने लिए. लेकिन फिर वादी में भारत का यूँ ज़िक्र आम बात है. जम्मू और लद्दाख में बात अलग है. बहरहाल पाँच दिनों बाद भूकंप प्रभावित इलाक़ों का दौरा पूरा हो चुका था. ख़ाली सड़क पर दौड़ती गाड़ी के शीशे पर चौदहवीं का चांद भी था और पहाड़ों पर बनी टीन की शेड में रह रहे ग़रीब लोगों की परछाइयाँ भी. पक्के मकानों के इंतज़ार में गुहार लगाती आवाज़ें कान में गूँज रही थीं ... देखिए देखिए जनाब यह ज़मीन धंस गई है. यहाँ हमारा मकान था. इतना बड़ा मकान था. यहाँ मैदान था जहाँ हमारे बच्चे खेलते थे.. आर्त आवाज़ों से लदी इन परछाइयों को लेकर हम श्रीनगर लौटते हैं. वहाँ भी आवाज़ें चीख चीख कर कहती हैं देखिए जनाब यहाँ भी सड़कें धसक गई हैं. सुरक्षा के बोझ तले स्वतंत्रता की ज़मीन धसक गई है. लेकिन कोई भी किसी एक जगह उंगली रख कर नहीं कह पा रहा कि यह भूकंप का केंद्र था. | इससे जुड़ी ख़बरें चरमपंथी हमले में सुरक्षाकर्मी की मौत15 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस जम्मू में चार सैनिक मारे गए10 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस सेक्स स्कैंडल अभियुक्तों को ज़मानत नहीं09 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस भूकंप के साल भर बाद भी मदद का इंतज़ार08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस बच्चों के सामने पहाड़-सी ज़िंदगी08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस कश्मीर में बाढ़ के कारण लाखों प्रभावित04 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस शांति प्रक्रिया में बाधा से आशंकित कश्मीरी31 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस कश्मीर में मुंबई धमाकों से जुड़ी गिरफ़्तारी04 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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