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सबसे ऊँचे मोर्चे पर मुस्तैद सैनिक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या है जो किसी को 20 हज़ार फुट की ऊँचाई पर लड़ने को मजबूर करता है? क्या है वो जज़्बा जो फ़ौजियों को प्रोत्साहित करता है दुनिया की सबसे ऊँची रणभूमि में ड्यूटी निभाने के लिए? जहाँ शत्रु से उनका जान का बड़ा दुश्मन मौसम है. जब सेना हम पत्रकारों को सियाचिन दिखाने ले गई तो हममें से ज़्यादातर कल्पना की उड़ान भर रहे थे. कितनी ठिठुरन होगी सियाचिन में जहाँ तापमान शून्य से 55 डिग्री सेल्सियस नीचे पहुँच जाता है. क्या हालत होगी हमारी, दिल्ली जैसे सपाट जगह पर रहने वालों की. इन दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जहाँ सामान्य से 60 प्रतिशत कम ऑक्सीजन मिलती है. दिल्ली से उड़ान भरकर हम लद्दाख स्थित थोइस एयरबेस पहुँचे, जहाँ लिखा था कि ये जगह दस हज़ार फीट की ऊँचाई पर है और ऑक्सीजन यहाँ सामान्य से तीस प्रतिशत कम है. हमें, भारी-भरकम कोट दिए गए, ऊनी टोपी भी. गर्मागर्म कहवा पीकर हम तैयार हुए हेलीकॉप्टर से सियाचिन बेस की उड़ान भरने के लिए. हेलीकॉप्टर से बाहर जहाँ तक आप देख सकते हैं, आपको बर्फ की चादर से ढके पहाड़ दिखते हैं, उनकी चोटियाँ आरी की तरह नुकीली, कहीं एक पेड़ नहीं, बस वीराने को चीरती चोटियाँ. गुलाब नहीं काँटों की भूमि विडंबना देखिए कि सियाचिन का मतलब होता है गुलाबों की भूमि. पर 78 किमी लंबे सियाचिन ग्लेशियर पर कब्ज़ा बनाए रखने की राह में गुलाब नहीं बिछे हैं और ये डगर ख़ासी कटीली है. इस विशाल और विकराल रणभूमि में सबसे बड़ी चुनौती है, सैनिकों को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रखना, उनका मनोबल बनाए रखना. सेना की माने तो भारत के लिए सियाचिन में बने रहना जहाँ सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहीं गौरव का भी प्रतीक भी है. ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की गर्मजोशी का सेना बहुत ठंडे दिमाग से आकलन करती है. उसका तर्क है कि हम मज़बूत स्थिति में हैं. पाकिस्तान सियाचिन से इतना दूर है कि उसे देख भी नहीं सकता. फिर कारगिल के बाद उसे पाकिस्तान पर विश्वास करने से परहेज़ भी है. पर सियाचिन का एक सच ये भी है कि यहाँ तीन करोड़ रुपए रोज़ खर्च होते हैं. हर महीने दो-तीन सैनिक मारे जाते हैं. 2003 से चाहे यहाँ बंदूकें चुप हो गई हों पर प्रकृति अपना विकराल रूप जब-तब दिखाती रहती है. भारी सिरदर्द और उल्टियां हमें कुछ घंटों में ही होने लगीं तो फिर उन सैनिकों की सोचिए जो देश की रक्षा में वहाँ तीन-तीन महीने तैनात रहते हैं और जिनका नारा है- अजीत है, अभीत है. सियाचिन दौरे ने मुझे ये सोचने पर मज़बूर किया कि क्या इन सैनिकों को ये सिद्ध करना ज़रूरी है. क्या सियाचिन पर कब्ज़े से ही भारत का गौरव बना रह सकता है या फिर किसी समझौते की राह पकड़ी जाए. | इससे जुड़ी ख़बरें सियाचिन छोड़ना नहीं चाहती सेना11 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस सियाचिन की ऊँचाइयों से30 मई, 2006 | भारत और पड़ोस सैनिकों के लिए भावनात्मक मुद्दा है सियाचिन30 मई, 2006 | भारत और पड़ोस घर और दुनिया से कटे होने का एहसास27 मई, 2006 | भारत और पड़ोस सैनिकों की जीवन रेखा की तरह है वायुसेना26 मई, 2006 | भारत और पड़ोस मुश्किलों की लंबी सूची है सियाचिन पर25 मई, 2006 | भारत और पड़ोस ऑक्सीजन की कमी से क्षमता पर असर24 मई, 2006 | भारत और पड़ोस पायलटों की कुशलता का इम्तेहान24 मई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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