|
ख़ामोशी को आवाज़ देने की कोशिश... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
खेतों में लहलहाती फ़सलें, कटने को तैयार सोने जैसी गेहूँ की बालियाँ, फ़िज़ा में ढोल की धमाल,पंजाब में बैसाखी का त्योहार दस्तक देने को तैयार है. यूँ तो पंजाब के अमूमन सभी गाँवों में माहौल इन दिनों रंगीन है पर पंजाब के छोटे से गाँव नंगलखिलाड़ियाँ के एक परिवार के लिए इस बार की बैसाखी कुछ ज़्यादा ही ख़ास है. यहाँ रहने वाले कश्मीर सिंह के परिवार वालों के लिए तो आजकल हर दिन त्योहार जैसा है. हो भी क्यों न..घर का मुखिया जब 35 साल बाद अपने गाँव, अपने घर लौटा हो तो किस घर में ख़ुशियाँ नहीं मनेगी. हम बात कर रहें हैं भारत के नागरिक-उन्हीं कश्मीर सिंह की जिन्होंने बतौर क़ैदी पाकिस्तान के जेल में अपने जीवन के 35 बसंत काल कोठरी में बिताए.. वो भी सज़ा-ए-मौत. कश्मीर सिंह की गुमनामी में बीती उन 35 बैसाखियाँ का हिसाब देना तो मुमकिन नहीं है पर हाँ चंद लोगों की सक्रियता की बदौलत वो आज अपने गाँव की सोंधी मिट्टी में..ख़ुली हवा में साँस ज़रूर ले रहे हैं. पिछले करीब साढ़े तीन दशकों से कश्मीर सिंह पाकिस्तान की जेल में क़ैद थे. आरोप था कि वे पाकिस्तान में जासूसी कर रहे थे. उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई गई थी. बीबीसी ने कश्मीर सिंह से लंबी बातचीत कर उनके जीवन के उन 35 सालों का लेखा-जोखा जानने की कोशिश है जो उन्होंने गुमनामी में जेल में बिता दिए. इन लेखों में उन्होंने अलग-अलग मुद्दों और पहलुओं पर बात की है. (कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों को बीबीसी श्रृंखला के रूप में पेश करेगी. इस श्रृंखला को आप हर बुधवार बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर पढ़ सकते हैं.) बात निकली तो... इन लेखों में ये जाँचने-परखने की कोशिश नहीं की गई है कि वो आख़िर किस मंशा से गए थे...न ये फ़ैसला करने की कि क्या सही है और क्या ग़लत... और न ही इसमें भारत-पाकिस्तान राजनीति और आपसी मुद्दों को उठाया गया है. ये सिर्फ़ उस व्यक्ति की कहानी उसकी ज़ुबानी जानने का प्रयास है जो जब जेल गया था तो जवान था, जिसका हँसता खेलता परिवार था लेकिन अब जब वो लौटा है तो उसकी पूरी दुनिया ही मानो बदल गई है. और जेल भी ऐसी जिसमें सज़ा का इंतज़ार करते-करते 27-28 साल का युवक करीब 60 साल का बूढ़ा हो गया..उसकी पहचान कश्मीर सिंह से इब्राहीम हो गई. कश्मीर सिंह से बातचीत का ये सिलसिला आसान नहीं था. किसी फ़िल्मस्टार या राजनेता से भी ज़्यादा मसरुफ़ियत इन दिनों कश्मीर सिंह की रही होगी. जब-जब उनसे मेरी बातचीत शुरू होती तो कभी उनके गाँव के लोगों का तांता लगा रहता, तो कभी उनका मान-सम्मान करने वाले संगठनों का. बात कुछ अजीब लग सकती है लेकिन जब कश्मीर सिंह से बात करने की घड़ी आई तो एक मिनट के लिए दिमाग़ खाली हो गया. पल भर पहले बीसियों सवाल मन में उमड़-घुमड़ कर रहे थे..लेकिन ऐन मौके पर समझ में नहीं आ रहा था कि बातचीत का सिलसिला कहाँ से शुरु हो. जिसका जीवन 35 सालों के लंबे अरसे में इतना बिखर गया हो, उस जीवन का कौन सा सिरा लेकर आगे बढ़ूँ? ख़ैर किसी तरह बात-चीत का आग़ाज़ हुआ तो बस बातें होती चली गईं…..बात निकली तो फिर दूर तलक गई. साक्षात्कार का ये सिलसिला किश्तों में चला और इसे अंजाम तक पहुँचाने में मेरे सहयोगी अतुल संगर ने पूरी मदद की. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों को बीबीसी श्रृंखला के रूप में पेश करेगी. इस श्रृंखला को आप हर बुधवार बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर पढ़ सकते हैं. ये कश्मीर सिंह के अतीत की, उनके वर्तमान की कहानी उन्हीं की ज़बानी कहने की एक कोशिश है...ये उस ख़ामोशी को कुछ अल्फ़ाज़ देने की कोशिश है जिसे 35 सालों तक कोई आवाज़ नहीं मिली. इन लेखों में दिए गए विचार ख़ुद कश्मीर सिंह के हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें सरबजीत की फाँसी 30 अप्रैल तक टली19 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस 'सरकार ने परिवार के लिए कुछ नहीं किया'07 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस मार्मिक जीवनी बनी कमाई का ज़रिया!06 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस कश्मीर और परमजीत की प्रेमकहानी05 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस 35 साल बाद 'कश्मीर' की भारत वापसी04 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस पैंतीस साल बाद कश्मीर आज़ाद03 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस डूबते को मिला तिनके का सहारा01 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||