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गुरुवार, 06 मार्च, 2008 को 15:13 GMT तक के समाचार
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मार्मिक जीवनी बनी कमाई का ज़रिया!

परमजीत अपने परिजनों के साथ
कश्मीर सिंह की पत्नी परमजीत ने 35 साल तक अपने पति का इंतज़ार किया
कश्मीर सिंह की देश वापसी हो गई और पूरे देश में उनकी वापसी के प्रति बहुत उत्सुकता भी थी. उत्सुकता जायज़ भी थी क्योंकि एक मायने में कश्मीर सिंह भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का चेहरा बन के उभरे.

उसके हर उतार चढ़ाव को उन्होंने जिया. काल कोठरी में 35 साल काटने के बाद जब उन्हें आज़ादी मिली तो उनकी खुशी और उनके मन में उठ रहे विचारों को हम महसूस कर सकते हैं.

ऐसी खुशी को मीडिया गाजे-बाजे से पेश करे यह भी लाजमी है. पर क्या ये लाजमी है कि एक इंसान की मार्मिक जीवनी को मीडिया पैसे कमाने का ज़रिया बना दे.

किसी के दर्द पर दो आंसू बहा दें तो कोई ग़म नही पर किसी के घावों को कुरेदने और श्रोताओं की भीड़ जुगाड़ने के लिए ऐसा करना क्या सही है?

35 साल बाद, शाम का वक़्त था जब कश्मीर सिंह ने जेल के बाहर क़दम रखा, खुली हवा में सांस ली और शायद उन्होंने ख़ुद की चिकोटी ली होगी कि जो वह देख रहे हैं और उनकी रिहाई की ख़बर क्या सब एक सच है या एक सपना.

अलग दुनिया

पर जेल के बाहर क़दम रखते ही दो बातें उन्हें समझ आ गई. पहली ये कि कैमरों के फ्लैश झूठ नहीं हो सकते और दूसरी कि जिस दुनिया को वो जानते समझते थे वो बिल्कुल बदल गई है.

कश्मीर सिंह
कश्मीर सिंह ने 35 साल पाकिस्तान जेल में बिताए

जो पत्रकार पेन से ख़बर लिखते थे, उनके माइक और कैमरे उनके हर क़दम को घेर रहे थे.

उन्हें अपने प्रियजनों से बात करने के लिए किसी ट्रंक कॉल की ज़रूरत नहीं पड़ी..किसी ने उनकी हथेली पर एक जादुई खिलौना रख दिया और उनकी भारत बात हो गई.

..ज़माना वाकई बदल गया था. पाँचसितारा होटल के नरम गद्दे पर भी उन्हें नींद नहीं आई. वे रात भर अपने परिवार की तस्वीर उकेरते रहे: कैसे दिखते होंगे अमरजीत, शीशपाल और बेटी मंजीत...और कैसी होंगी उनकी पत्नी परमजीत जिनकी सज़ा उनसे भी बड़ी थी. अकेले परिवार को संभालना, बच्चों को बड़ा करना.

सभी क़ानूनी कार्रवाइयों के बाद वे भारत-पाकिस्तान सीमा पर पहुँचे तो उनकी धड़कनें तेज़ हो गईं.

तमाशा

पाकिस्तान में अपने मददगारों को तहे-दिल से शुक्रिया कर उन्होंने अपनी सरज़मीन पर क़दम रखा तो वहां मौजूद उनके दोस्तों, रिश्तेदारों, गांववालों और पत्रकारों ने तालियों से उनका स्वागत किया.

अपनी डॉक्टरी जांच करवाकर उन्होंने कुछ भावनात्मक पल अपनी पत्नी परमजीत और बेटे शीशपाल के साथ बिताए..फिर वे अपने परिवार के साथ मीडिया के सामने आए...

 बार-बार यह सवाल कि आप को कैसा लगा, से तंग आ कर आखिरकार वे भी फट पड़े...कितनी बार पूछोगे कि कैसा लग रहा है

और तब हुआ तमाशा जो उनके ज़माने मे नहीं होता था. तब लाइव टेलीविज़न नहीं था, तब कैमरे के लिए दर्द नहीं परोसा जाता था.

इतनी भीड़ और कैमरे देख कश्मीर भौचक रह गए. उनकी शर्मीली पत्नी परमजीत उनकी रिहाई की ख़बर से ही रोज़ कैमरे का सामना करना सीख गई थी.

वही हाल उनके पुत्र शीशपाल का भी था... पर बार-बार यह सवाल कि आप को कैसा लगा, से तंग आ कर आखिरकार वे भी फट पड़े...कितनी बार पूछोगे कि कैसा लग रहा है.

सीमा सुरक्षा बल की पत्रकारों के लिए बनी सीमा भी कश्मीर के पहुंचते ही टूट गई. हर टेलीविज़न चैनल सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज़ देना चाहता था. सब नंबर वन बनना चाहते थे.

कश्मीर सिंह को फिर चाहे कैमरे से चोट ही क्यों न पहुंच जाए, साथी पत्रकार चाहे घायल ही क्यों न हो जाए, सभ्यता की सारी सीमाएं भले ही टूट जाएं.

टीआरपी का खेल

आख़िर नई टीवी पत्रकारिता का पहला पाठ जो दिया जाता है वह यह कि टीआरपी कमाने वाली कहानी के लिए कुछ भी किया जा सकता है. कुछ भी. फिर धूप में घंटों खड़े रहने के बाद धैर्य खोते पत्रकारों को आंखों मे आंसू लिए कश्मीर और परमजीत से वो भला कैसे खुश होते.

उन्हें चाहिए था कुछ गले मिलना, कुछ नए ज़माने का व्यवहार. सबके सामने अपनी भावनाओं की नुमाइश जो कश्मीर और परमजीत यूं भी कभी न करते क्योंकि ये उनकी संस्कृति नहीं है.

एक महिला टीवी पत्रकार ने अपना गुस्सा उन नेताओं पर उतारा जो टीवी की मांग के अनुरूप कश्मीर और उनके परिजनों से वो सब न करवा सके जो टीआरपी के लिए ज़रूरी था.

न कश्मीर ने ज़मीन चूमी न बीवी को गले लगाया...तो फिर भारत की ऑस्ट्रेलिया पर जीत के मुक़ाबले वो कैसे इस रिपोर्ट को बेच पाएंगे, ये सभी पत्रकारों की चिंता थी.

शायद इसी चिंता के कारण एक पत्रकार ने कश्मीर को युद्धबंदी बना दिया. कौनसा युद्ध, कैसा युद्ध. उनकी गिरफ़्तारी के समय तो दोनों देश मैदान-ए-जंग में नहीं थे. पर ये तो एक छोटा सा तथ्य है.

कहानी के लिए इसे भी भूला जा सकता है. और ये भी कि किसी के आंसू पैसा बन के खनके तो आंसू बेचने से परहेज़ कैसा. इतना सोचेंगे तो टीआरपी नाम की चिड़िया किसी और चैनल के पास उड़ जाएगी.

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