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बर्मा में एक और विपत्ति की आशंका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी सहायता एजेंसी ने चेतावनी दी है कि बर्मा में तूफ़ान पीड़ितों तक तत्काल सहायता नहीं पहुँची तो स्थिति गंभीर हो सकती है. इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी की ये चेतावनी संयुक्त राष्ट्र के इस बयान के बाद आई है जिसमें उसने कहा था कि अभी कुल पीड़ितों में से मात्र एक चौथाई तक ही सहायता पहुँच पाई है. सप्ताह भर पहले आए तूफ़ान से 15 लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए हैं. बर्मा सरकार तूफ़ान में मृतकों की संख्या 25 हज़ार से कम बताती है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि मरनेवालों की संख्या एक लाख़ से ज़्यादा हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस का कहना है कि लोगों ने स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सुरक्षित बचे बड़े भवनों में पनाह ले रखी है. इन शरण स्थलों तक में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है, और चारों तरफ़ गंदगी है. अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस के प्रवक्ता जो लोरी के अनुसार राहत सामग्री धीरे-धीरे बर्मा पहुँचने लगी है, लेकिन वो पर्याप्त नहीं है. उनका कहना था, " शनिवार तक तीन विमान पहुँच चुके थे. इन विमानों पर 14 टन राहत सामग्री और तंबू हैं. हमें सात और विमानों के पहुँचने की उम्मीद है. इनमें से दो विमान तो रविवार रात पहुँच जाएँगे, जबकि पाँच अन्य सोमवार तक पहुंच पाएँगे. इन राहत सामग्रियों को बिना किसी देरी के स्थानीय रेडक्रॉस सोसायटी के ज़रिए वितरित करने की व्यवस्था की गई है." लोरि ने कहा कि शनिवार तक दो लाख 20 हज़ार लोगों तक कुछ न कुछ सहायता पहुँच चुकी थी. लेकिन पर्याप्त संख्या में तंबू उपलब्ध कराना बहुत बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा कि सोमवार को रेडक्रॉस का एक दल नरगिस तूफ़ान से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करेगा. इस बीच संयुक्तराष्ट्र ने बर्मा के तूफ़ान पीड़ितों के लिए 14 करोड़ डॉलर की तत्काल सहायता की अपील की है. महामारी का ख़तरा संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता रिचर्ड हॉर्सि ने कहा कि तूफ़ान पीड़ितों तक सहायता पहुँचने में हुई सप्ताह भर से ज़्यादा की देरी के कारण महामारी का ख़तरा बढ़ गया है.
उनका कहना था, " स्वच्छ पेयजल की कमी और सफ़ाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण हैज़ा और अतिसार जैसी बीमारियों के फैलने का बहुत ज़्यादा ख़तरा है. यदि इस पर क़ाबू नहीं पाया गया तो विनाश का एक दूसरा दौर शुरू होगा जिसका असर तूफ़ान जितना ही भयावह होगा." दूसरी ओर बर्मा का सैन्य शासन अब भी विदेशी नागरिकों को राहत सामग्री वितरित करने की अनुमति नहीं दे रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि बर्मा अपने दम पर तूफ़ान की विभीषिका से नहीं निपट सकता है. इसके बावजूद अभी तक सरकार विदेशी राहतकर्मियों को देश में आने की इजाज़त नहीं दे रही है. शनिवार को संयुक्तराष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के ट्रकों का एक काफ़िला 22 टन राहत सामग्री के साथ थाइलैंड से बर्मा पहुँचा, लेकिन राहतकर्मियों को सीमा पार नहीं करने दिया गया. इसबीच देश में इतनी बड़ी मानवीय आपदा के बीच संसाधनों को जनमत संग्रह में लगाने के लिए बर्मा सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है. |
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