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शुक्रवार, 09 मई, 2008 को 13:45 GMT तक के समाचार
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'आपदा में जनमत संग्रह बिल्कुल ग़लत'

बर्मा
बर्मा में क़रीब एक लाख लोग पिछले सप्ताह के तूफ़ान में मारे गए हैं
बर्मा की निर्वासित सरकार के सांसद डॉक्टर टिन श्वे ने कहा है कि वहाँ की सैन्य सरकार का शनिवार को देश में जनमत संग्रह कराने का फ़ैसला बिल्कुल अनुचित है.

उन्होंने कहा कि सरकार आपदा की स्थिति का फ़ायदा उठाकर जनमत संग्रह करवाना चाहती है और इस दौरान दुनिया के अन्य देशों तक सही बात न पहुंचे, इसीलिए राहतकर्मियों और विदेशी लोगों को आने से रोक रही है.

ग़ौरतलब है कि बर्मा के सैन्य शासन ने विश्व समुदाय से स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि तूफ़ान के बाद की स्थितियों से निपटने में अगर कोई मदद करना चाहता है तो आर्थिक रूप से सहायता दे सकता है.

पिछले सप्ताह तूफ़ान में एक लाख लोगों के मारे जाने के बाद जो विकट स्थिति पैदा हुई है, उसमें मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर से जो मदद भेजी गई थी, शुक्रवार को सैन्य शासन ने उसे भी सील कर दिया.

बर्मा की सरकार के इस क़दम पर जब बीबीसी ने बर्मा के नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी पार्टी के सांसद टिन श्वे से उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो उन्होंने कहा कि सैन्य शासन के विदेशी सहायता को रोकने और राहतकर्मियों को न आने देने के पीछे एक दूसरी राजनीति की बू आ रही है.

टिन श्वे की पार्टी को 1990 में बर्मा के पहले बहुदलीय चुनाव में अभूतपूर्व जीत मिली थी. हालांकि इनको अभी तक सरकार चलाने का मौका सैन्य शासन ने नहीं दिया है. टिन श्वे दिल्ली में रह रहे हैं और निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री है.

अमानवीय सोच

उनका मानना है कि दरअसल वर्तमान सैन्य सरकार शनिवार को नए संविधान पर होने वाले जनमत संग्रह के दौरान किसी विदेशी को देश के भीतर नही देखना चाहती है.

 मै कुछ देशों की इस राय से सहमत हूँ कि अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मानवीय आधार पर हस्तक्षेप करना चाहिए. इसके अलावा हम लोगों के पास कोई उपाय नहीं है. अगर हम और लाखों लोगों को मरने से बचाना चाहते हैं तो ये ज़रूरी है
टिन श्वे, निर्वासित सरकार के सांसद

उन्होंने कहा, "सैन्य शासन की यह सोच विदेशियों के ख़िलाफ़ उनकी मानसिकता को दिखलाता है. खासतौर पर जनमत संग्रह के दौरान वो बाहर के किसी भी व्यक्ति की मौजूदगी को पसंद नहीं करेंगे. कारण साफ़ है क्योंकि जनमतसंग्रह स्वतंत्र तरीके से नहीं होगा और वे नहीं चाहते हैं कि ये बात जग जाहिर हो."

उन्होंने तूफ़ान के बाद के बिगड़े हालात की ओर इशारा करते हुए कहा, "ऐसे विपदा के समय कोई भी नागरिक जनमत संग्रह नहीं चाहेगा लेकिन सैनिक शासन को लोगों की फ्रिक कहाँ है. हमारी पार्टी ने स्थिति को देखते हुए ही अपील की है कि यह समय जनमत संग्रह कराने का नहीं है. देश की पूरी ताकत राहत कार्य में लगनी चाहिए. सैनिक सरकार मदद के रूप मे पैसे मांग रही है ताकि उसको भी जनमत संग्रह की प्रक्रिया में लगाया जा सके."

बर्मा में 1988 मे प्रजातंत्र के समर्थन मे हुए देशव्यापी आंदोलन के बाद 2008 के नर्गिस चक्रवात को देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप मे देखा जा रहा है.

वर्ष 1962 से वहाँ सैन्य शासन है. बर्मा एशिया के सबसे ग़रीब देशों में है और इस भयंकर चक्रवात ने इसकी अर्थव्यस्था को और झकझोर दिया है.

'दखल दे सुरक्षा परिषद'

जब उनसे पूछा गया कि संयुक्त राष्ट्र ने सैनिक शासन पर अंतरराष्ट्रीय राहत को देश में आने की इजाज़त देने का ज़ोर दिया है लेकिन सैन्य सरकार के आज के ताज़ा बयान से क्या समझा जाए.

बर्मा
बर्मा की सैन्य सरकार ने विदेशी राहतकर्मियों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है

इसपर टिन श्वे ने कहा, "सबसे पहले तो मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सराहना करना चाहता हूँ लेकिन मुझे लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय बर्मा के सैन्य शासन को कमतर आक रही है. मै कुछ देशों की इस राय से सहमत हूँ कि अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मानवीय आधार पर हस्तक्षेप करना चाहिए. इसके अलावा हम लोगों के पास कोई उपाय नहीं है. अगर हम और लाखों लोगों को मरने से बचाना चाहते हैं तो ये ज़रूरी है."

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रूस और चीन अभी तक इस पहल का विरोध कर रहे है. अगर कुछ जल्दी नहीं किया गया तो अभी कई जानें और जाएंगी.

टिन श्वे की यह आशंका निराधार नहीं कही जा सकती है. इस चक्रवात को आए एक सप्ताह गुज़र गया है लेकिन राहत कार्य जिस रफ्तार से चलना चाहिए था, वैसा हो नहीं पा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम के प्रवक्ता का कहना है कि राहत कार्य के लिए सैन्य सरकार का विदेशी सहायकों को वीजा मना करना अब तक के मानवीय सहायता के इतिहास मे कभी नहीं हुआ है.

इन सबके बीच शनिवार को होने वाला जनमत संग्रह कितना न्याय संगत है, सैन्य सरकार से यह सवाल कौन पूछेगा...

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