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'तूफ़ान में एक लाख से ज़्यादा मारे गए' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा यानी म्याँमार में अमरीकी राजनयिकों का कहना है कि तूफ़ान से मारे जाने वालों की संख्या एक लाख से ज़्यादा हो सकती है. दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र ने राहत पर चिंता जताते हुए कहा है कि सहायता लोगों तक समय पर नहीं पहुँच पा रही है. बर्मा में इस शनिवार को लगभग 200 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से समुद्री तूफ़ान नरगिस आया था जिसने इरावॉडी नदी के मुहाने से जुड़े इलाक़े में भारी तबाही मचाई थी. सरकार का कहना है कि तूफ़ान से 22 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और 41 हज़ार से ज़्यादा लोग लापता हैं. बर्मा में अमरीका के दूतावास की प्रमुख शारी विलारोसा का कहना है कि प्रभावित इलाक़ों में 95% इमारतों को नुक्सान पहुँचा है और स्थिति बेहद ख़राब है. संयुक्त राष्ट्र की चिंता संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा है कि बर्मा को हर प्रकार की सहायता देश में आने देना चाहिए. लेकिन जानकार कहते हैं कि बर्मा को ये बात पसंद नहीं है कि महीनों तक विदेशी और ख़ासकर अमरीकी उसके इलाक़े में काम करें क्योंकि प्रभावित क्षेत्रों में उसके और चीन के कुछ सैनिक अड्डे भी हैं. इस बीच, भारत और थायलैंड और कुछ सहायता एजेंसियों की मदद बर्मा तक पहुँचने लगी है लेकिन ये आपदा जितनी बड़ी है उसके मुकाबले सहायता बहुत कम है. बर्मा के सैन्य शासन ने तूफ़ान प्रभावित लोगों की मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र को राहत सामग्री लिए एक विमान को आने की अनुमति दी है. इस विमान में करीब 25 टन राहत सामग्री है. बर्मा के पड़ोसी और सहयोगी देशों से भी राहत सामग्री आना शुरू हो गई है. हालांकि ये आशंका अभी भी जताई जा रही है कि बाहरी देशों को बर्मा आने की अनुमति मिलने में हो रही देरी से राहत कार्यों में बाधा आ रही है. बीबीसी संवाददाता पॉल डानाहर का कहना है कि 1989 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के बाद से ये बर्मा के सैन्य शासकों के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती है. संयुक्त राष्ट्र आपदा राहत एजेंसी (ओसीएचए) के प्रवक्ता रिचर्ड हॉरसी के मुताबिक सरकार ने बर्मा के विदेश मंत्री को नियुक्त किया है कि वो राहत एजेंसियों के वीज़ा आवेदन पत्रों का कामकाज देखें. संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम ने बर्मा के शहर रंगून में खाने-पीने की सामग्री बाँटनी शुरु कर दी है. भारत ने भी दो जहाज़ भेजे हैं. चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक चीन से 66 टन राहत सामग्री बर्मा पहुँच गई है. 'राहत सामग्री पर राजनीति न हो' अमरीका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने भी राहत कार्यों के लिए पैसा देने की बात कही है लेकिन उनके लिए बर्मा में आना एक मुद्दा बना हुआ है. बर्मा के सैन्य नेता पश्चिमी देशों से दूरी बनाकर चलते आए हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया और अमरीका समेत कई देशों ने बर्मा के नेताओं से अपील की है. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रुड ने कहा, "राजनीति को भूल जाएँ. सिर्फ़ लोगों तक राहत पहुँचाने की ओर काम करें." बर्मा में कई इलाक़े अभी भी कटे हुए हैं और सड़कों पर वृक्ष गिरे पड़े हैं और मलबा बिखरा हुआ है. एक प्रत्यक्षदर्शी ने एएफ़पी को बताया, "लोगों के चेहरों पर जैसे कोई भाव नहीं बचा है. ज़िंदगी में उन लोगों ने ये स्थिति कभी नहीं देखी. लोगों ने परिवारवालों को खो दिया है, रहने के लिए घर नहीं है और खाना भी नहीं है." यूनिसेफ़ का कहना है कि जो लोग बच गए हैं उनके पास पीने का पानी नहीं है और पनाह लेने के लिए जगह नहीं है. बाढ़ के चलते मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलने की आशंका है जबकि गंदे पानी से हैजा और दस्त फैलने का डर जताया जा रहा है. इस बीच माना जा रहा है कि शनिवार को बर्मा में प्रस्तावित संविधान पर होने वाला जनमतसंग्रह निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होगा. |
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