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बर्मा की सहायता पर हो रही है राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा के सरकारी रेडियो और टीवी पर आ रहे समाचारों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. बर्मा के लिए यह किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है. बर्मा के सरकारी मीडिया के अनुसार शनिवार को आए तूफ़ान में 22 हज़ार लोग मारे गए हैं और 60 हज़ार अन्य लापता हैं. उधर रंगून में संयुक्त राष्ट्र के राहतकार्य संयोजक ने आरोप लगाया है कि सरकार कुछ प्रभावित इलाक़ो में राहतकर्मियों को जाने देने से हिचकिचा रही है. एक अनुमान के मुताबिक बर्मा की जनसंख्या पाँच करोड़ के आसपास है और इनमें से आधे इलाके तूफ़ान से प्रभावित हैं. प्रभावित लोग समुद्री तट के पास बसे शहर लापुटा शहर के डॉक्टर आये क्यू ने बीबीसी की बर्मीज़ सेवा को बताया कि कम से कम आधा शहर पानी की डूब में आ गया है – ‘जो लोग इलाज के लिए लाए जा रहे थे मैंने उनसे पूछा कि कितने लोग ज़िंदा बचे हैं. उनका कहना था कि सिर्फ़ दो-तीन सौ लोग जिंदा बच पाए हैं. मैने पूछा, तुम्हारे इलाक़े में कितने लोग थे? पूछने पर उनका कहना था 5,000 लोग.
‘पहले तो तेज़ हवाओं के साथ ऊँची लहरें आईं. कुछ तो 15 से 20 फ़ीट ऊँची थीं. फिर कई घर तेज़ हवाओं से टूटे. जो लोग ज़िंदा बच पाए, उनमें से कई लोग किसी तरह पेड़ों से चिपके रहे. लेकिन एक तरफ़ पानी का तेज़ बहाव था और दूसरी तरफ़ तेज़ आँधी. जो लोग बच पाए, वो काफ़ी बुरी हालत में हमारे पास आए.’ प्रभावित इलाक़ों में से कुछ में सहायता एजेंसियाँ पहुँचने लगी हैं. बर्मा में रेड क्रॉस के 18,000 स्थानीय सहायताकर्मी हैं. रेडक्रॉस के जेनेवा स्थित मुख्यालय में बर्मा को भेजी जा रही सहायता का काम देख रही हैं क्रिस्टीन साउथ कहती हैं कि ‘दक्षिणी बर्मा के शहर लापुता के बारे में जो हमें जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक वहाँ 95 फ़ीसदी घरों को नुकसान पहुँचा है. इनमें से 70 फ़ीसदी मकानों को गंभीर नुकसान पहुँचा है. दवाइयाँ, बेंडेज, पीने का पानी, ऐसी चीज़ों की वहाँ सख़्त ज़रूरत है.’ इरावॉडी नदी के मुहाने को बर्मा का धान का कटोरा कहा जाता था लेकिन समुद्री तूफ़ान नर्गिस से सबसे ज़्यादा प्रभावित यही इलाक़ा है. इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि बर्मा में हालात किस कदर ख़राब हैं. जो लोग बच गए हैं उन्हें सहायता की जल्द ज़रूरत है. ये त्रासदी इतने बड़े स्तर पर है कि बर्मा की सैनिक सरकार को भी मजबूरन संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं से सहायता लेना पड़ रहा है. बर्मा की सैनिक सरकार इसकी इजाज़त कतई नहीं देना चाह रही थी. पहली सहायता संभवत: थायलैंड से पहुँची. भारत की सहायता भी सबसे शुरुआती मदद करने वालों में शामिल है. सहायता की राजनीति सहायता की राजनीति भी दिलचस्प है. अमरीका ने पहले ढाई लाख डॉलर की सहायता करने की घोषणा की. इसके मुकाबले चीन की सहायता चार गुना ज़्यादा थी. अपनी दूसरी घोषणा में अमरीका ने कहा कि वह तीस लाख डॉलर सहायता भेजने को तैयार है बशर्ते कि बर्मा सरकार सहयोग करे.
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कहते हैं, ‘हम अमरीका की नौसेना को मदद के लिए भेज सकते हैं. नौसेना लापता लोगों को ढूँढ सकती है, वहाँ की स्थिति को सामान्य बनाने में मदद कर सकती है. लेकिन ऐसा करने के लिए बर्मा की सैनिक सरकार को हमारी आपदा सहायता टीमों को वहाँ जाने की इजाज़त देनी होगी.’ लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जो चाहते हैं, बर्मा की सरकार वह नहीं होने देना चाहती. जानकार कहते हैं कि अमरीका ने बर्मा को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अलग-थलग करने के लगातार प्रयास किये हैं और बर्मा को अमरीका पर थोड़ा भी विश्वास नहीं है. बीबीसी बर्मीज़ सेवा के संवाददाता थू यीएन कहते हैं, बर्मा सरकार को डर है कि जो अमरीकी दल सहायता का अंदाज़ा लगाने के नाम पर आएँगे, वो बर्मा और चीन के सैनिक अड्डों की गोपनीय जानकारी भी इकट्ठा कर सकते हैं. थू यीएन कहते हैं, ‘बर्मा की सरकार नहीं चाहती कि विदेशी, ख़ासतौर पर अमरीकी लोग इन इलाक़ों में जाएँ क्योंकि प्रभावित इलाक़ों में हायेन्जी आयलैंड्स जैसे इलाक़े भी शामिल हैं जहाँ बर्मा और चीन के नौसैनिक अड्डे हैं.’ आँग सान सू को सम्मान अमरीका के राष्ट्रपति ने मंगलवार को आँग सान सू की को कॉन्ग्रेशनल गोल्ड मेडल से सम्मानित किया.
इसका मकसद बर्मा को ये बताना है कि अमरीका वहाँ लोकतांत्रिक शक्तियों को मज़बूत होते देखना चाहता है. लेकिन बर्मा के पत्रकारों का कहना है कि अमरीका के इस कदम पर बर्मा के लोग ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं क्योंकि आधी जनसंख्या की जद्दोजेहद किसी तरह ज़िंदा रहने की है. इस तरह की सांकेतिक राजनीति से उनका दिमाग कोसों दूर है. बर्मा के पत्रकारों का कहना है कि भारत के मौसम विशेषज्ञों ने शनिवार को आए समुद्री तूफ़ान नर्गिस के बर्मा तक जाने की जानकारी 48 घंटे पहले ही दे दी थी. बर्मा के रेडियो और टीवी ने इसे जारी भी किया था लेकिन न तो सरकार ने इससे निपटने के व्यापक प्रबंध किए और न ही लोगों को इन ख़बरों से महसूस हुआ कि ये कोई बड़ी आपदा है जो आधे बर्मा को अपनी चपेट में ले लेगी. बहरहाल, अब सारा ध्यान तूफ़ान से बचे लोगों को मदद पहुँचाने की ओर लगाने की कोशिश है. लाखों लोग बेघर हैं, कई जगहों पर खाना और पीने का पानी नहीं मिल रहा है, पेट्रोल, डीज़ल और केरोसीन की भारी कमी है और अधिकतर प्रभावित इलाक़ों में बिजली नहीं है. | इससे जुड़ी ख़बरें बर्मा में भीषण तूफ़ान, 350 से ज़्यादा मरे04 मई, 2008 | भारत और पड़ोस तूफ़ान में मृतकों की संख्या दस हज़ार से ज़्यादा05 मई, 2008 | भारत और पड़ोस संयुक्त राष्ट्र की सहायता की पेशकश05 मई, 2008 | भारत और पड़ोस तूफ़ान के बाद तबाही का मंज़र06 मई, 2008 | भारत और पड़ोस पीड़ितों के लिए भारत ने मदद भेजी06 मई, 2008 | भारत और पड़ोस बर्मा में मृतक संख्या 15 हज़ार06 मई, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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