BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 16 फ़रवरी, 2008 को 05:55 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
धार्मिक यात्राओं के लिए रियायत का सवाल

धार्मिक चिन्ह
आंध्र प्रदेश सरकार के ईसाइयों को तीर्थयात्रा के लिए रियायत को लेकर सवाल उठने लगे हैं
धर्म भारत में जीवन का अहम हिस्सा है, धार्मिक अनुष्ठान और धार्मिक स्थलों की यात्राओं पर भारत में ग़रीब-अमीर सभी बढ़-चढ़ कर खर्च करते हैं.

शायद इसी तथ्य को देखते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी को राज्य की दो फ़ीसदी ईसाई आबादी का ख्याल आया.

और उन्होंने घोषणा की कि ईसा मसीह की जन्मस्थली यरुशलम की यात्रा के लिए उनकी सरकार सब्सिडी देगी.

इस पर दिल्ली के एक चर्च के पादरी डोमिनिक ईमैनुअल कहते हैं, "तीर्थ यात्राओं में काफ़ी खर्च आता है. ऐसे में अगर कोई सरकारी या ग़ैर सरकारी संस्था मदद करती है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए."

ज़ाहिर है हज की तरह सब्सिडी की घोषणा से जहां सियासत तेज़ होगी वहीं तीर्थ यात्राओं में रियायतें नहीं मिलने वालों की नाराज़गी बढ़ेगी.

हज सब्सिडी

धार्मिक यात्राओं के लिए कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को रियायतें देना हमेशा से ही विवादास्पद रहा है.

 तीर्थ यात्राओं में काफी खर्च आता है और सब्सिडी का स्वागत किया जाना चाहिए
डोमिनिक ईमैनुअल, फ़ादर, दिल्ली चर्च

विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदुवादी संगठन इसे तुष्टिकरण की नीति का एक और उदाहरण बताते हैं.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राम माधव का कहना है, "सब्सिडी राजनीतिक उद्देश्य के लिए दी जा रही है और सरकार को इन सब में नहीं पड़ना चाहिए."

भारत में क़रीब एक लाख सत्तावन हज़ार हज यात्री हर साल मक्का-मदीना जाते हैं.

इनमें से एक लाख दस हज़ार यात्रियों को सब्सिडी का फ़ायदा मिलता है.

चालीस दिन रहने, खाने-पीने और जाने-आने पर एक हाजी को 60 से 80 हज़ार रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जो रियायत दी जाती है वो केवल हवाई टिकटों में होती है.

धार्मिक संगठनों की बैठक
आंध्र प्रदेश सरकार ने यरुशलम यात्रा के लिए दो प्रतिशत रियायत की घोषणा की है

हज कमेटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहम्मद उवैस हालांकि इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते.

उनका कहना है, "हज यात्रा में 30 हज़ार से 50 हज़ार रुपए हवाई टिकट में लगते हैं और अगर सरकार इसमें खुली बोली करती है तो इससे यात्री को ज़्यादा फ़ायदा होगा."

ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि ये सब्सिडी नेताओं और नौकरशाहों की कमाई का ज़रिया बन गई है.

कितनी जायज़ है सब्सिडी ?

सब्सिडी चाहे कितनी भी हो, सवाल ये भी उठता है कि धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले एक लोकतांत्रिक देश में, क्या इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए धन खर्च करना चाहिए ?

क्या धार्मिक यात्राएं करवाना सरकार का काम है ?

इतिहासकार महमूद फ़ारूकी कहते हैं कि- "तीर्थ यात्राओं के लिए दी जाने वाली सब्सिडी पूरी तरह ख़त्म कर देनी चाहिए. चाहे वो हज की सब्सिडी हो या फिर कोई और रियायत."

 सब्सिडी राजनीतिक उद्देश्य के लिए दी जा रही है और सरकार को इन सब में नहीं पड़ना चाहिए.
राम माधव, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

वहीं, पादरी डोमिनिक ईमैनुअल ये भी कहते हैं कि, "भारत में शिक्षा, बीमारियां और आवास जैसे कई ऐसी ज़रूरतें हैं, जिन पर खर्च करने के लिए सरकार को प्राथमिकता देनी चाहिए."

मुस्लिम बुद्धिजीवी जहां इस बात को बार-बार कहते हैं कि उनके समुदाय ने कभी रियायतों की मांग नहीं की, वहीं एक सच्चाई ये भी है कि इसका कभी खुलकर विरोध भी नहीं किया गया.

देश के मुसलमान कहते हैं कि वैष्णों देवी, तिरुपति बालाजी, चीन स्थित मानसरोवर की यात्रा या फिर कुंभ मेले पर सरकार जो धन खर्च करती है क्या उसे सब्सिडी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ?

 अगर सरकार इसमें खुली बोली करती है तो इससे यात्री को ज़्यादा फ़ायदा होगा
मोहम्मद उवैस, हज कमेटी

वहीं, हिंदू संगठनों का कहना है कि सरकार मानसरोवर यात्रा के दौरान हाथ में कोई पैसा नहीं देती.

बल्कि, चीन सरकार से केवल अनुमति लेने में सरकार मदद लेती है और 40 सदस्यों वाले 16 समूह हर साल वहां जाते हैं.

इन संगठनों का कहना है कि तीर्थ यात्राओं के दौरान सुरक्षा और आपात स्थिति का खर्च सरकार ही उठाती है और ये हर धर्म के धार्मिक स्थलों के लिए होती है. इसे सब्सिडी नहीं माना जाना चाहिए.

हिंदुओं का धार्मिक स्थल
तीर्थ यात्रा के लिए सब्सिडी दिए जाने पर फिर ऐतराज़ जताया जा रहा है

भारत में सरकारें अब भी राजा-महाराजा और बादशाहों की तरह धर्म के मामलों में धन देकर पुण्य कमाना चाहती हैं.

इतिहासकार महमूद फ़ारूकी मानते हैं कि, "लोकतंत्र में लोकलुभावन घोषणाएं होना लाज़मी है. और इस तरह के ऐलान हर जगह होते हैं. ये लोकतंत्र के उतार-चढ़ाव हैं जो बरक़रार रहेंगे."

अब ये लोगों को तय करना है कि धर्म के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी सियासी दांवपेंच है या उनकी भलाई के लिए उठाया जाने वाला सरकारी क़दम.

ताजमहल...सामने
इरफ़ान हबीब कहते हैं कि ऐतिहासिक स्मारकों का धर्म से कोई संबंध नहीं.
राष्ट्रपति भवन की छतरीकसौटी पर आज़ादी
58 वर्ष के बाद कहाँ पहुँचा भारत और क्या हैं चुनौतियाँ, रेहान फ़ज़ल की पड़ताल.
प्यार के गणित का हल
गुजरात में एक लड़की ने अपने प्रेमी को पाने के लिए अनोखा तरीक़ा ढूँढ़ निकाला.
विद्रोहपहला स्वाधीनता संग्राम
क्या 1857 का विद्रोह पहला स्वतंत्रता संग्राम था. जानिए, इतिहासकार इरफ़ान हबीब से
मौलाना एजाज़ अहमद असलम...सामने
मौलाना एजाज़ असलम मानते हैं कि पोप ने ग़लत बात का हवाला दिया है.
इससे जुड़ी ख़बरें
धर्म में तोड़-मरोड़ न करें: पोप
21 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना
सोने की पालकी ननकाना साहिब पहुँची
30 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>