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1857: हिंदुस्तान का ख़याल, धर्म का असर

दीवाने आम
कई हिंदू सिपाहियों ने मुगल बादशाह को अपना नेतृत्वकर्ता माना
वर्ष 1857 से पहले भी विद्रोह हुए लेकिन इसके पैमाने को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था. 19वीं शताब्दी में पूरी दुनिया के औपनिवेशिक देशों में इतना बड़ा विद्रोह नहीं हुआ.

एक लाख से भी अधिक सेना ने इसमें भाग लिया. इसके अलावा जो लोग इस विद्रोह में शामिल हुए उसमें किसान, ज़मींदार और पुराने शिक्षित लोग थे. छपाई और प्रेस का भी इस्तेमाल हुआ.

पूरे हिंदुस्तान का नक़्शा विद्रोहियों के दिमाग में था. ख़ासतौर से महारानी विक्टोरिया के दावे का जो जवाब उन्होंने दिया वो पढ़ने लायक था.

ये बातें पहले के विद्रोहों में नहीं थीं. ये अलग बात है कि उनके प्रतिरोध की भी अपनी अहमियत थी.

1857 के विद्रोह के बाद संचार के साधन जैसे रेलवे और छापे-खाने बढ़े. इससे राष्ट्रीयता की भावना तो बढ़ी ही लेकिन इसके साथ ही धार्मिक और जातीय अधार पर बड़े-बड़े संघ भी बन गए.

हिंदुस्तान का ख़याल, धर्म का असर

इस दौर से पहले कभी ये ख़याल नहीं आता था कि हम पूरे देश के हिंदू हैं या पूरे देश के मुसलमान हैं और हमारी इतनी संख्या है. शादी-विवाह भी एक सीमित क्षेत्र में ही हुआ करते थे.

मेरा ये मतलब नहीं है कि इससे पहले जात-पात नहीं था, खूब था. लेकिन जाति या संप्रदाय के आधार पर संघ नहीं थे. आधुनिकीकरण के साथ राष्ट्रीयकरण तो बढ़ा पर संप्रदायों का राजनीतिकरण भी हुआ.

 1857 में हिंदुस्तान का ख़याल था, धर्म का असर भी था और मतातंर भी था लेकिन ये ख़याल नहीं था कि पूरे मुल्क के हिंदू एक तरफ हैं और मुसलमान दूसरी तरफ़
इतिहासकार इरफ़ान हबीब

इसको हिंदू और मुसलमान के संदर्भ में ज़्यादा देखा जा सकता है. हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों स्थापित हुए.

1857 में हिंदुस्तान का ख़याल था, धर्म का असर भी था और मतातंर भी था लेकिन ये ख़याल नहीं था कि पूरे मुल्क के हिंदू एक तरफ़ हैं और मुसलमान दूसरी तरफ़.

अब आज इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती कि सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने के लिए हिंदू और मुसलमान एक साथ आए.

आज की तारीख़ में तो सिर्फ़ इस पर जा सकते हैं कि विद्रोही नेताओं का बयान क्या था.

अभी तक मुझे ऐसा कोई बयान नहीं मिला जिसमें कहीं भी हिंदुओं ने कहा हो कि सिर्फ़ अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए मुसलमानों का साथ ले रहे हैं और जीतने के बाद उनको अलग कर देंगे. और न ही कभी मुसलमानों के ऐसे बयान मिलते हैं.

बल्कि दोनों संप्रदायों में इस बात पर सहमति थी कि हिंदू और मुसलमान में अंतर है पर हम साथ रहते हैं और रहना है.

उनके मन में ये था कि अंग्रेज़ हमसे बिल्कुल अलग हैं और हमारे देश को लूट रहे हैं.

जब कोई इतना बड़ा आंदोलन होता है तो उसमें लोगों की निजी शिकायतें भी होती हैं पर मार्क्स जैसे विचारक ने तो इसे क्रांति की संज्ञा दे दी थी.

ये तो कहा ही जाता है कि कारतूस को लेकर अगर अंग्रेज़ इतना नहीं अड़ते तो बात नहीं बढ़ती. ये अलग बात थी कि बाद में चर्बी वाले कारतूस अगर अंग्रेज़ वापस भी लेते तो सिपाही अंग्रेज़ के वफादार नहीं बनते.

राजघरानों की भूमिका

अवध के राजदरबार अपने हित की वजह से सिपाहियों के साथ आए थे, झाँसी की रानी अपने सौतेले बेटे की सत्ता कायम करना चाहती थी. लेकिन एक बार जब विद्रोह शुरू होता है तो उसका अपना संवेग होता है.

विद्रोह
विद्रोह में रियासतों के अपने हित भी थे तो दूसरी ओर लोगों में अंग्रेज़ों को हटाने की इच्छाशक्ति भी.

कुंवर सिंह ने जो अभियान चलाया उसे ये नहीं कहा जा सकता कि ये सिर्फ़ निजी लड़ाई थी.

जहाँ तक कुछ राजघरानों की गद्दारी का सवाल है तो ऐसा सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं किया. हर किसी का अपना आकलन था.

जिन क्षेत्रों में विद्रोह का ज़्यादा जोर नहीं था वहाँ के राजाओं को लगा कि अंग्रेज़ जीत जाएंगे, लिहाज़ा उन्होंने उस हिसाब से सोचा. उत्तर प्रदेश में जितना विद्रोह का असर था उतना पंजाब नहीं था.

हारने वाले का रिकॉर्ड नहीं होता लेकिन जहाँ-जहाँ विद्रोहियों ने अपना प्रशासन कायम किया वहाँ निकलने वाले उर्दू के अख़बारों से ये पता चलता है कि उनके अहसास क्या थे.

जाहिर है कि अंग्रेज़ों ने जो लिखा वो अपने हिसाब से लिखा और उसे गद्दर तक नहीं कहा. पर इससे ये नहीं कहा जा सकता कि कम से कम कुछ ही लोगों ने सही दूसरे पक्ष को प्रस्तुत करने का ईमानदार कोशिश नहीं की.

ये तो है ही कि अंग्रेज़ों के जमाने में 1857 के विद्रोह के बारे में निष्पक्ष रूप से लिखना मुश्कल था.

150 साल बाद इसकी अहमियत अलग-अलग नज़र से दी जाती है. कोई ये सोचता है कि उनके इलाक़े में बगावत हुई और यहाँ बड़ी बहादुर से लड़ा गया, मैं इसे बुरा नहीं मानता.

असल में ये चीज याद रखनी चाहिए कि ये बड़े इलाक़े में लड़ा गया और ये हिंदुस्तान की लड़ाई थी.

उस समय उर्दू के अख़बार में विद्रोहियों को हिंदुस्तान का सिपाही या हमारी सेना से संबोधित किया जाता था. देश में हिंदुस्तान की भावना विकसित हो रही थी.

जाहिर है कि जब कत्लेआम शुरू हो गए तो इसका असर कम ही हुआ और आम लोगों ने ही ग़द्दर का नाम दे दिया.

बाद के लेखन में दिखने लगा कि कहाँ हिंदू विद्रोही ज़्यादा थे और कहाँ मुस्लिम विद्रोही. अब भी कुछ लेखन में इस तरह की बातें होती हैं लेकिन विद्रोह करने वाले नेताओं के दिमाग में ये बात नहीं थी.

इसलिए हमें अपने पूर्वजों से सीख लेने की ज़रूरत है.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

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