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रविवार, 20 अगस्त, 2006 को 01:32 GMT तक के समाचार
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आज़ादी के 58 साल बाद स्वतंत्रता सेनानी माना

देवी प्रसाद
दर्ज़नों सरकारें बदलीं लेकिन देवी प्रसाद की गुहार कहीं नहीं सुनी गई
छत्तीसगढ़ की इस्पात नगरी के नाम से मशहूर भिलाई की एक झोपड़-पट्टी में रहने वाले देवी प्रसाद शर्मा इस बार 15 अगस्त पर बेहद ख़ुश थे.

इस बार का स्वतंत्रता दिवस उनके लिए कई मायनों में अलग था. आज़ादी के 58 साल बाद ही सही, पहली बार सरकार ने माना कि वे स्वतंत्रता सेनानी हैं.

आज़ादी के पहले लगभग 15 साल तक ज़ेल में रह कर अपनी देशभक्ति की क़ीमत चुकाने वाले देवी प्रसाद शर्मा आज़ादी के 58 सालों बाद तक सरकारी दफ़्तरों में सिर्फ़ इसलिए चप्पलें चटकाते फिरते रहे क्योंकि सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानने से इनकार कर दिया.

राज्य बदले, राज बदला, दर्ज़नों सरकारें बदलीं लेकिन देवी प्रसाद शर्मा की गुहार कहीं नहीं सुनी गई. वे कहते हैं, "एक लड़ाई मैंने अंग्रेज़ों से लड़ी और उससे लंबी लड़ाई मुझे अपनों से लड़नी पड़ी."

 पिता जलियाँवाला बाग में शहीद हो गए थे. बड़े भाई भी 1930 के लाहौर आंदोलन में गुजर गए. ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ भाषण देने के आरोप में बहन को पुलिस ने इतनी प्रताड़ना दी कि उन्होंने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली
देवी प्रसाद शर्मा

लाहौर में 11 जनवरी 1919 को जन्मे देवी प्रसाद शर्मा बताते हैं कि उनके पिता लाला हरदयाल जालियाँवाला बाग के जनसंहार में मारे गए थे.

वे कहते हैं, "इसके बाद बड़े भाई कांता प्रसाद भी 1930 के लाहौर आंदोलन में शहीद हो गए. ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ भाषण देने के आरोप में बहन को पुलिस ने इतनी प्रताड़ना दी कि बहन ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली."

आज़ाद हिंद फ़ौज़

देवी प्रसाद शर्मा के अनुसार बहन की प्रताड़ना का बदला लेने के लिए उन्होंने एक पुलिस इंस्पेक्टर शामद ख़ान की हत्या कर दी.

फिर लाहौर से फ़रार हो कर चटगाँव होते हुए सिंगापुर चले गए और बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गए.

देवी प्रसाद
देवी प्रसाद नेताजी की आज़ाद हिंद फ़ौज का हिस्सा बने और अंग्रेज़ो से लड़े

देवी प्रसाद गर्व के साथ बताते हैं, "मैं आज़ाद ब्रिगेड एसएस बटालियन दो का सदस्य था. आज़ादी की लड़ाई अंतिम दौर में थी. मणिपुर जाते समय हमारी बटालियन पर हमला हुआ और हम लोग गिरफ़्तार हो गए. हमें रंगून में 20 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई."

आज़ादी के बाद भारत सरकार के हस्तक्षेप से 1960 में देवी प्रसाद को रिहा किया गया. देवी प्रसाद जब देश लौटे तब उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था.

(देवी प्रसाद के बारे पढ़कर आपके मन में क्या सवाल उठे? आप किसे ज़िम्मेदार मानते हैं? आप चाहें तो साथ में दिए गए फ़ॉर्म में अपनी राय हमें भेज सकते हैं)

सरकार ने भी रिहाई के बाद उनकी सुध नहीं ली. मेहनत मज़दूरी करते हुए वे भिलाई जा पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपना घर बसाया. उसके बाद शुरू हुई उनकी दूसरी लड़ाई.

देवी प्रसाद को जब पता चला कि भारत सरकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पेंशन देती है और उनका नाम आज़ादी के लिए लड़ने वालों में कहीं नहीं है तो उन्होंने भोपाल से लेकर दिल्ली तक आवाज़ लगाई.

लंबी लड़ाई

वे कहते हैं, "सच कहूँ, तो पैसों की ज़रूरत तो थी लेकिन उससे बड़ा दुख इस बात को लेकर था कि मुझे स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना जा रहा था."

 मैं अपनी लड़ाई जीत चुका हूँ. अब कम से कम चैन से मर सकूँगा. हाँ, ये दुख हमेशा रहेगा कि जिस आज़ादी के लिए मैंने अपनी जवानी क़ुर्बान कर दी, वो आज़ादी तो मिली ही नहीं
देवी प्रसाद

देवी प्रसाद ने राज्य और केंद्र सरकार को कई-कई आवेदन दिए. सरकारें आती और जाती रहीं. कार्रवाई चलती रही, फ़ाइलें अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रहीं.

इसी बीच छत्तीसगढ़ राज्य बना और जिस कलेक्टर जे श्रीवास्तव ने उनका आवेदन सत्यापित करवाने में मदद की थी, उसी की पदस्थापना सामान्य प्रशासन विभाग में हुई और देवी प्रसाद शर्मा के आवेदन पर कार्रवाई तेज़ हुई.

देवी प्रसाद शर्मा दुख के साथ कहते हैं, "इतने सालों की लंबी लड़ाई के बाद सरकार ने पिछले साल मुझे पत्र लिख कर माना कि मैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हूँ."

ये और बात है कि उस पत्र में उन्हें हर माह पाँच हज़ार रुपए बतौर पेंशन देने की घोषणा की गई थी, लेकिन कई माह गुजर जाने का बाद भी अब तक उन्हें एक धेला नहीं मिला है.

देवी प्रसाद की मानें तो उन्हें ये रुपए चाहिए भी नहीं. वे कहते हैं, "मैं अपनी लड़ाई जीत चुका हूँ. अब कम से कम चैन से मर सकूँगा. हाँ, ये दुख हमेशा रहेगा कि जिस आज़ादी के लिए मैंने अपनी जवानी कुर्बान कर दी, वो आज़ादी तो मिली ही नहीं."


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