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रविवार, 13 अगस्त, 2006 को 09:39 GMT तक के समाचार
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'चुनावी राजनीति में दखल की ज़रूरत'

अरुणा रॉय
चुनावी और संसदीय राजनीति और जनांदोलनों के बीच एक तरह की खाई बन गई है
छह दशक पहले भारत जन आंदोलनों के संघर्ष के चलते ही आज़ाद हुआ और इन्हीं जन आंदोलनों से देश का राजनीतिक स्वरूप बना. राजनीतिक दल बने. पर आज चुनावी और संसदीय राजनीति और जन आंदोलनों के बीच एक तरह की खाई बन गई है.

चिंता यह है कि इस खाई को पाटने की कोशिश नहीं हो पा रही है और अगर हो भी रही है तो सफ़लता हासिल नहीं हो रही है. एक तरफ नैतिकता की दुहाई है तो दूसरी ओर नैतिकता छोड़कर राजनीति करने वाले दल.

भारत में पिछले छह दशकों में मुख्यधारा की राजनीति का जो इतिहास रहा है, जन आंदोलनों का इतिहास उससे छोटा नहीं है.

जन आंदोलनों ने सबसे पीड़ित वर्गों, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे पर अपनी बात को सामने रखने का जो एक स्थान बनाया है और अपने सवालों को जिस तरह से सामने रखते हुए एक तरह का दखल दर्ज किया है, मैं समझती हूँ कि वो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है.

यह बात और है कि राजनीति का इतिहास कई रूपों में दर्ज होता रहा है जबकि मुख्यधारा में जन आंदोलनों को उतनी जगह नहीं मिली.

प्रभाव

इन छह दशकों में जन आंदोलनों के अपने खट्टे-मीठे अनुभव रहे हैं पर इनके अस्तित्व का जो असर सामाजिक ढाँचे और राजनीति पर पड़ा है, उसे नकारा नहीं जा सकता.

भूदान से लेकर आपातकाल तक और फिर गुजरात तक ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं.

ख़ासकर इस रूप में एक मंच मिला है जहाँ से दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, पीड़ितों और कई दूसरे वर्गों को अपनी बात रखने का मौका मिला है.

दूसरा यह कि वैश्विक समुदाय के सामने जो विषमताएँ और विडंबनाएँ हैं, चाहे वो विकास की नीतियों में एक बड़े हिस्से की अनदेखी का प्रश्न हो, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात हो, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन की नीतियाँ हों या फिर पर्यावरण से जुड़े सवाल रहे हों, हमने अपनी बात को देश और दुनिया के सामने मज़बूती से रखा है.

कभी हम इन संघर्षों में सफल हुए हैं तो कभी असर नहीं भी हुआ है.

जन आंदोलनों के बने रहने की एक वजह यह भी है कि कठिन से कठिन दौर में भी हमने अपनी बात रखी है. हम इस ग्लानि के साथ नहीं मरेंगे कि हम बोले नहीं.

सफलताएँ

आज़ाद भारत में अगर जन आंदोलनों की भूमिका पर नज़र डालें तो राजनीतिक दखल की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता जेपी आंदोलन को मिली है.

इसके अलावा चुनावी राजनीति से अधिकार पाकर उसका दुरुपयोग करने वालों के ख़िलाफ़ नक्सलवादी आंदोलन ने भी अपना एक स्थान बनाया है. वो बात अलग है कि उनका आधार अलग रहा है.

विकास संबंधी योजनाओं की मुख़ालफ़त करते हुए भी कई आंदोलन जन्में और इनमें सबसे प्रमुख भूमिका रही है नर्मदा बचाओ आंदोलन की. भूख से मरते लोगों के देश में रोज़गार गारंटी योजना और व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए सूचना का अधिकार कानून इस दिशा में ऐतिहासिक जीत हैं.

अंबेडकर के दलित अधिकारों को लेकर शुरू किए गए कुछ प्रयास थे. दलितों की आज की स्थिति को देखें तो इन छह दशकों में उनमें अपनी ताकत को लेकर एक समझ भी आई है और उनका राजनीतिक दखल भी बना है.

प्रदर्शन
जनांदोलनों की भूमिका देखें तो राजनीतिक दख़ल की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता जेपी आंदोलन को मिली

पर सवाल यह है कि आप अपनी लड़ाई में उस राजनीतिक ढाँचे को अपनाएँगे जो पहले से बना हुआ है या फिर एक वैकल्पिक ढाँचे तैयार करने के लिए भी प्रयास करेंगे. यह भी सवाल आज सभी जन आंदोलनो के सामने हैं.

चुनौतियाँ

सबसे बड़ी बात तो यह है कि कथनी और करनी के फ़र्क से भी ऊपर उठना होगा. साथ ही यह भी स्थापित करना होगा कि हम भी एक राजनीतिक शक्ति हैं और संसदीय सचिवालय के गलियारों के अलावा गाँवों-कस्बों में भी एक तरह की राजनीतिक धारा है जिसे महत्व देना होगा.

आज अगर लोकतंत्र को फिर से पारिभाषित करने की ज़रूरत है और नैतिकता से अलग हो चुकी राजनीति को दिशा देने की ज़रूरत है तो मेरी समझ में इसमें जन संगठनों की एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है और उन्हें यह भूमिका निभानी पड़ेगी. यही सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी है और चुनौती भी.

ऐसा लग रहा है कि जन आंदोलनों को चुनावी राजनीति में अपना दखल बनाना होगा क्योंकि सत्ता के गलियारों में विकास विरोधी लोग विकास के नाम पर देश को बेच रहे हैं. ऐसी स्थिति में हमारा बाहर खड़े रहकर केवल चिल्लाते रहने से काम चलने वाला नहीं है.

अब इसका स्वरूप क्या होगा. क्या ऐसा संभव हो सकेगा. क्या हम अपने आपसी विरोधाभाषों से ऊपर उठकर एकसाथ कोशिश कर सकते हैं और अगर हाँ तो उसका स्वरूप क्या होगा. आज ऐसे कई सवाल हमारे सामने हैं जिनका जवाब हमें खोजना होगा.

(पाणिनी आनंद के साथ बातचीत पर आधारित)

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