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'सफलता का मापदंड - पंडित नेहरू की नीति' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत की विदेश नीति में सक्रिय भूमिका निभा चुके इंदर कुमार गुजराल से बीबीसी हिंदी सेवा ने पिछले छह दशक में भारतीय विदेश नीति के आकलन और उनके अनुभवों के बारे में बातचीत की. पेश हैं इस बातचीत के कुछ अंश: सवाल- पिछले छह दशक की भारतीय विदेश नीति को आप किस तरह देखते हैं? क्या भारत स्वतंत्र विदेश नीति बनाने में सफल रहा है? जवाब- हिंदुस्तान की विदेश नीति संघर्ष के दिनों में ही बन गई थी. आज़ाद होने के चंद महीने पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एशिया कॉन्फ्रेंस बुलाई थी जिसमें उन्होंने इसे अंतिम स्वरूप दिया. सबसे बड़ी कामयाबी ये रही है कि हम जवाहरलाल नेहरू के दिखाए रास्ते पर चले हैं और उस नीति को हम सबने निभाया है. नीति यही थी कि हम अपनी विदेश नीति ख़ुद बनाएँगे जो स्वतंत्र होगी. इसलिए जितने भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री इन 60 वर्षों में बने इस बात पर दृढ़ रहे. नेहरू जी की विदेशी नीति का दूसरा पहलु था कि ऐसे देशों के साथ ज़्यादा चलेंगे जो हमारे पड़ोसी है और जिन्होंने गुलामी के दिन भी काटे हैं. चाहे वो अफ्रीका के हों या फिर एशिया के. इसलिए हमारी गुटनिरपेक्षता ही हमारी विदेश नीति की बुनियाद है.
सवाल- गुटनिरपेक्षता की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत की उतनी सक्रिय भूमिका नहीं रही जो पहले हुआ करती थी और बड़े-बड़े मुद्दों पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन शिथिल पड़ा दिखाई देता है. क्यों? 'गुटनिरपेक्षता न्यूट्रैलिटी नहीं' जवाब- आमतौर पर गुटनिरपेक्षता का मतलब ग़लत समझा जाता है. पंडित जी ने कई बार कहा गुटनर्पेक्ष का मतलब न्यूट्रैलिटी यानि तटस्थता नहीं है. इसका मतलब है - किसी गुटबंदी में शामिल न होना और अपनी विदेश नीति अपने हितों को देखकर बनाना और उसपर दृढ़ता से कायम रहना. सरकारें बदलीं, प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री बदले लेकिन स्वतंत्र विदेश नीति पर हम सब कायम रहे, यही गुटनिरपेक्षता भी है. पंडित नेहरू का कहना था - दोस्ती सबसे करेंगे पर विदेश नीति हम ख़ुद तय करेंगे. सवाल- चीन के साथ भारत का युद्ध क्या पंचशील की असफलता या नेहरू जी की विदेश नीति में कमी नहीं थी? जवाब- नहीं, चीन उस वक़्त एक नए युग से निकल रहा था. भारत-चीन युद्ध चीन की अपनी नीति की विफलता थी. याद रखिए कि लड़ाई के बावजूद पंडित जी ने कभी यूएन में जाकर यह नहीं कहा कि चीन को इस जगह शामिल न करें या उधर शामिल न करें. इसलिए आज इतने वर्षों बाद चीन के साथ हमारे रिश्ते सुधर रहे हैं और दोस्ती की तरफ बढ़ रहे हैं.
सवाल देखने में आया है कि भारत-पाकिस्तान संबंधों में जब कुछ बात आगे बढ़ती है तो फिर किसी न किसी कारण से तनाव उत्पन्न हो जाता. भारत-पाकिस्तान संबंध किस मोड़ पर खड़े हैं? जवाब- आज का दिन तो फिर पुर-उम्मीद है. पाकिस्तान के अंदर एक नई आवाज़ उठ रही है कि भारत के साथ दोस्ती करने में फ़ायदा है. मै यही कहता हूँ कि हम सातों पड़ोसी देशों का हित इकट्ठा रहने में है. मैंने ये भी कहा था कि ऐसा करने के लिए हिंदुस्तान जो भी कुछ कर सकता है. पड़ोसियों के लिए करेगा. दो बातों को छोड़कर - हम धर्मनिरपेक्षता के ऊपर समझौता नहीं कर करेंगे और अपनी धरती किसी को नहीं दे सकते. उस वक़्त की बात तो पुरानी हो गई लेकिन वो दृष्टि कायम है. सवाल- लेकिन भारत के कई पड़ोसी देश मानते हैं कि भारत 'बिग ब्रदर' की तरह बर्ताव करता है यानि धौंस जमाता है. क्या विफलता है कि भारत अपने पड़ोसियों के बीच विश्वास बढ़ा नहीं पाया? जवाब- नहीं, ये बात नहीं है भारत 'बिग' ज़रूर है पर उस तरह से 'बिग ब्रदर' नहीं है. आहिस्ता-आहिस्ता सब हमारी दृष्टि को देख रहे हैं. आज नेपाल संवर रहा है. हम संवरते नेपाल के साथ हैं लोगों के साथ हैं. बांग्लादेश के अंदर आंतरिक हालात ख़राब हो रहे हैं लेकिन हम इन हालात का फ़ायदा कभी नहीं उठाना चाहते.
'मनमोहन की नीति ठीक है' सवाल भारत-अमरीका रिश्तों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है. ऐसे आरोप भी लगे हैं कि भारत-अमरीका समझौता भारत के हितों के ख़िलाफ़ है. आप क्या मानते हैं? जवाब- पंडित जी के समय से ही हिंदुस्तान के अमरीकियों के साथ संबंध अच्छे थे. परमाणु मुद्दे पर मैं सोचता हूँ कि 18 जुलाई को मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के बीच जो बातचीत हुई थी वह भारत के हित में है. सीधे शब्दों में बात यह है कि जब भारत ने परमाणु शक्ति का इज़हार किया था उस वक़्त अमरीका ने हमारे ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाए थे. अब प्रतिबंध हटाने की बात है प्रतिबंध हट जाए इसमें हमारा फ़ायदा है. चाहे हमारे जो मतभेद हों, लेकिन आज जो नीति मनमोहन सिंह इस वक़्त चला रहे हैं मैं उसके हक में हूँ. सवाल तो क्या आप विपक्ष या मार्क्सवादी पार्टी की तरह नहीं मानते कि 18 जुलाई को हुई बातचीत के बाद परमाणु समझौते के मूल सिद्धांतों को बदला जा रहा है और अमरीका इससे ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना चाहता है. जवाब- अगर अमरीका 18 जुलाई की बात पर कायम रहे तो मैं उसके साथ हूँ और यही बात मनमोहन सिंह कह रहे हैं. राजनीतिक दलों में तो मतभेद होते ही रहते हैं यह लोकतंत्र में आम बात है. हमारा फ़ायदा इस बात में है कि 18 जुलाई की बात को मानकर प्रतिबंध हट जाए और हम बड़े बिजली घर लगा सकें तो यह भारत के हक में है.
सवाल- इसराइल और लेबनान की स्थिति हो या इससे पहले इराक., संयुक्त राष्ट्र जैसे निष्क्रिय हो गया है. अमरीका ही एक 'सुपर पावर' रह गया है और जो चाहता है, करता है. आपकी प्रतिक्रिया. जवाब- इसराइल और लेबनान में जो हो रहा है उससे मैं चिंतित हूँ. यह इसराइल की ज़्यादती है जिस ढ़ंग से लेबनान के लोगों पर बम फेंक रहा है. इसराइल अपने मुल्क में कायम रहे हम इस बात के हक में हैं. और फ़लस्तीनियों को भी अपनी आज़ादी का हक़ है. जवाब- यदि अमरीका ही बड़ी ताकत बची है तो मतलब ये नहीं कि हम अमरीका के ख़िलाफ़ हो जाएँ. लेकिन हमने अमरीका से कहा है कि वह जिस तरह- से इसराइल को प्रोत्साहन दे रहा है हम उसके ख़िलाफ़ हैं. अमरीका कई बार ऐसी बातें करता है जिसके लिए हम उसकी निंदा करते हैं और करना भी पड़ेगा. ऐसा करने में घबराना नहीं चाहिए. यदि अमरीका हमारे क्षेत्र में भी शांति को भंग करने की कोशिश करना चाहे तो हम उसका साथ नहीं देंगे और न ही देना चाहिए. सवाल- इन छह दशकों में विदेश नीति के संदर्भ में सबसे सफल प्रधानमंत्री किसे मानते हैं? जवाब-जवाहरलाल नेहरू. उन्होंने सोच भी बनाई और देश के आगे नक्शा भी रखा और एक नई किस्म का आदर्श भी हमको दिया था. जवाहरलाल नेहरू के नाम से ही हमारी विदेश नीति शुरू होती है. हमारी कामयाबी या नाकामी जांचने का एक ही तरीका है कि हम पंडित जी के आदर्शों पर कायम रहे कि नहीं रहे और रहे तो कितने रहे. |
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