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गुरुवार, 01 अप्रैल, 2004 को 15:22 GMT तक के समाचार
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चुनाव में इंदिरा गाँधी की परीक्षा हुई

इंदर कुमार गुजराल
कांग्रेस को 1962 के चुनाव में बहुत बड़ी जीत मिली थी. मगर उसके बाद चीन के साथ युद्ध हो गया जिससे देश को तो झटका लगा ही पंडित जवाहर लाल नेहरू को भी बड़ा आघात पहुँचा.

पंडित जी की मौत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज ने काफ़ी कुशलता से नेतृत्व का मसला सुलझा लिया और लाल बहादुर शास्त्री को नेता घोषित कर दिया.

फिर जब लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ तब पहली बार कांग्रेस में नेतृत्व के लिए चुनाव हुआ जिसमें इंदिरा गाँधी एक ख़ास 'सिंडिकेट' के भरोसे जीत गईं.

जिन लोगों ने इंदिरा गाँधी को जिताया था वे सोचते थे कि वह एक कमज़ोर प्रधानमंत्री साबित होंगी मगर वक़्त ने उन लोगों को ग़लत साबित कर दिया.

फिर 1967 का पहला चुनाव था जिसमें इंदिरा गाँधी लोगों के बीच चुनाव मैदान में उतरीं. उस समय ये इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को देखना था कि नेतृत्व पर मोहर लगती है या नहीं.

उस समय जनसंघ ने गोरक्षा से जुड़ा बयान दिया था.

फिर उस वक़्त जब नतीजे आए तो जीत का अंतर बहुत नहीं था और किसी हद तक हम कह सकते हैं कि विपक्ष पहली बार मज़बूत रूप में सामने आया.

पहले के कुछ चुनाव तक तो विपक्ष कमज़ोर ही रहा था और एक समय तो स्थिति ये थी कि 1957 में पंडित नेहरू ने ख़ुद कहा था कि आचार्य कृपलानी और कुछ नेताओं के विरुद्ध लोगों को खड़ा नहीं किया जाए.

मगर 1967 में स्थिति बदली. उस समय एक स्वतंत्रता पार्टी भी अस्तित्त्व में आई. ये पार्टी राजगोपालाचारी ने बनाई थी जिनकी सोच कांग्रेस से अलग थी. पीलू मोदी और मीनू मसानी जैसे कई बड़े क़द के नेता भी उसमें शामिल थे.

आगे चलकर 1967 के बाद तो मैं भी सरकार में रहा और कई विभाग देखे.

फिर 1967 के बाद बड़ी तब्दीलियाँ आईं. 1971 में युद्ध हुआ और 1972 में चुनाव हुए.

उस समय इंदिरा जी की शख़्सियत काफ़ी बड़ी थी. जंग के बाद एक बार फिर इंदिरा गाँधी ही चुनाव का मसला बन गई थीं.

उनके अलावा उनकी सरकार की नीतियों पर लोगों ने मतदान किया.

उस चुनाव के बाद विपक्ष के बड़े नेताओं के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी उभरे थे. मगर उस समय तक कांग्रेस पार्टी टूट की कगार पर चल पड़ी थी.

तब और अब के समय में काफ़ी अंतर आ गया है. अब तो चुनाव काफ़ी महँगे हो गए हैं.

उस समय आम तौर पर जो भी लोग चुनाव में लड़ते थे उनके चरित्र पर कोई उंगली नहीं उठाता था. आदर सबका था.

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