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झारखंड में भाजपा को परेशानी

झारखंड
झारखंड राज्य बनने के बाद पहली बार लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं
क्या आगामी लोकसभा चुनाव झारखंड की राज्य सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह होंगे?

यहां भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है.

साथ ही यह सवाल भी है कि क्या झारखंड अपने साथ गठित उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ की तरह अपनी पहली सरकार को धूल चटाएगा?

ऐसे संकेत हैं जो इस संभावना को बताते हैं और इससे भाजपा के चुनाव प्रबंधकों को चिंतित होना चाहिए.

इस छोटे राज्य में भाजपा का काफी कुछ दांव पर लगा है.

पिछले लोकसभा चुनाव में उसने राज्य की 14 में से 11 सीटें जीती थीं, और आंकड़ों के हिसाब से देखें तो इसमें कुछ भी अप्रत्याशित न था.

भाजपा का गढ़?

पिछले दसेक वर्षों में झारखंड और उससे पहले दक्षिण बिहार का यह हिस्सा भाजपा के एक गढ़ के रूप में उभरा है.

किसी आदिवासी बहुल इलाक़े में उसकी यह पहली मज़बूत घुसपैठ थी.

1996 और 1998 के चुनावों में भाजपा ने यहां से 12-12 सीटें जीती थीं.

पिछले दो चुनावों में भाजपा को 45 फीसदी वोट मिले जबकि उसका कोई प्रतिद्वंद्वी 25 फीसदी वोट भी न पा सका.

1991 में ही इस इलाक़े में कोई दल भाजपा से बेहतर प्रदर्शन कर सका था.

तब झारखंड मुक्ति मोर्चा ने छह स्थान जीते थे जबकि भाजपा को 5 सीटें मिलीं थीं.

इसी के बाद मोर्चा के सांसदों को घूस देने का कांड हुआ और इसमें मोर्चा और इसके नेता शिबू सोरेन की प्रतिष्ठा काफ़ी गिरी.

अक्सर ऐसे घोटालों में फंसे लोगों और उनकी पार्टी को मतदाताओं ने दंडित नहीं किया, पर झारखंड में आदिवासी वोटरों ने शिबू सोरेन और उनकी पार्टी को दंडित किया.

और उसके बाद से भाजपा का परचम लहराता रहा है.

आदिवासी वोट

इस आदिवासी बहुल प्रदेश में भाजपा की इतनी स्पष्ट जीत का मतलब यह नहीं है कि उसे आदिवासियों का ज़्यादा वोट मिलता रहा है.

आदिवासी
आदिवासियों के वोटों पर चुनाव बहुत कुछ निर्भर करता है

यहां भाजपा के समर्थकों की एक अलग जमात है.

इसने ईसाई न बने आदिवासियों, जिन्हें सदान कहा जाता है, पर ख़ास जोर दिया.

फिर ऊपरी जाति के ग़ैर-आदिवासी समर्थकों और पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रहने वाले महतो मतदाताओं को जोड़कर इसने अपना अच्छा वोट समूह जुटाया.

झारखंड मुक्ति मोर्चा को आदिवासियों, ख़ासकर संथालों और अल्पसंख्यकों का वोट मिलता रहा.

कांग्रेस का समर्थन सभी समूहों में था और औरतों में इसको ज़्यादा वोट मिलते हैं.

भाजपा के अधिक वोटर मर्द हैं.

पर आंकड़ों के गणित को बारीकी से देखने पर साफ़ हो जाएगा कि भाजपा की सफलता असल में विपक्षी वोटों के बिखराव से है.

राज्य में भाजपा और झामुमो के अलावा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी प्रमुख खिलाड़ी है.

कांग्रेस राज्य के गैरसंथाल आदिवासियों में काफ़ी मजबूत है जबकि राजद का आधार उत्तरी झारखंड के ग़ैर-आदिवासियों में है.

भाजपा की पहुंच वैसे पूरे प्रदेश यानी इसके तीनों क्षेत्रों में है.

भाजपा की परेशानी

ऐसे में भाजपा का सही मुक़ाबला तभी हो सकता है जब तीनों क्षेत्र में उसके मुख्य विपक्षी हाथ मिला लें.

बाबूलाल मरांडी और लालकृष्ण आडवाणी
गुटबाज़ी के चलते पहले मुख्यमंत्री मरांडी को हटा देना पड़ा

1991 के चुनाव में जनता दल का झामुमो से गठबंधन था.

लेकिन इस बार कांग्रेस के अलग लड़ने से भाजपा को पांच स्थान जीतने में सुविधा हुई, तब कांग्रेस को अकेले 18 फीसदी वोट आए थे.

अगले चुनाव में सभी अलग-अलग लड़े और भाजपा सिर्फ 34 फीसदी वोट पाकर ही इस क्षेत्र में 14 में से 12 सीटें जीत गई.

1998 के चुनाव में गैर-भाजपा दलों ने गठबंधन किया लेकिन उस बार भाजपा के पक्ष में लहर थी.

1999 में यदि विपक्षी दलों में गठबंधन हुआ होता तो भाजपा को परेशानी होती पर सबके अलग-अलग लड़ने से भाजपा एक बार फिर 12 सीटें जीतने में कामयाब हो गई.

लेकिन इस बार भाजपा को बदली परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.

झारखंड के इलाक़े
उत्तर - चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, धनबाद, हज़ारीबाग
दक्षिण - राँची, जमशेदपुर, सिंहभूम, खुंटी, लोहारगढ़ा, पलामू
संथाल परगना - राजमहल, दुमका, गोड्डा

इस बार वह नया राज्य बनाने का वादा नहीं कर सकती.

राज्य बनने के बाद हुए चुनाव में उसका प्रदर्शन पहले से ख़राब हुआ.

उस बार भाजपा और उसेक सहयोगी समता पार्टी को सिर्फ 32 फीसदी वोट मिले थे और मुश्किल से बहुमत मिला.

सरकार बनाने के बाद से भी उसकी उपलब्धियां कुछ खास नहीं रही हैं.

पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को भाजपा की अंदरूनी बगावत के चलते ही हटाया जा चुका है.

नौकरियों में मूलवासी के लिए आरक्षण के प्रावधान ने राज्य में भारी बवाल मचाया और अभी भी मूलवासी तथा बाहर से आए बहुमत के बीच साफ़ दरार दिखती है.

नए राज्य से आदिवासियों की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं.

और प्राकृतिक संसाधन की लूट पहले से भी ज़्यादा रफ्तार से जारी है जिससे काफ़ी नाराज़गी है.

यह उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के संसदीय सीट, दुमका में जब मई 2002 में उप चुनाव हुआ तो भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा.

शिबू सोरेन ने वह चुनाव बड़े आराम से जीता.

नए मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तेज़तर्रार और लोकप्रिय हैं लेकिन पार्टी के सारे असंतोष को शांत करने में सफल नहीं हुए हैं.

उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी भाजपा विधानसभा का पोरेया हाट उपचुनाव हार गई.

इन संकेतों से भाजपा नेतृत्व को चिंता होनी चाहिए.

पर इससे भी ज्यादा चिंता की बात है कांग्रेस के नेतृत्व में सारे प्रमुख विपक्षी दलों का एकजुट हो जाना.

गठबंधन

इस बार कांग्रेस, झामुमो, राजद और भाकपा ने हाथ मिलाया है.

इनमें से हर किसी का अलग-अलग आधार है और इससे भाजपा को परेशानी होगी.

झामुमो का संथालों में असर है तो राजद का उभार झारखंड के पिछड़ों में.

कांग्रेस का पूरे प्रदेश में प्रभाव है पर दक्षिण झारखंड के आदिवासियों में उसका ज़्यादा असर है.

अब इतना जरूर है कि यह गठबंधन भी समस्याओं से भरा है.

नक्सलवादी
नक्सलवादियों का भी कई क्षेत्रों में प्रभाव है

झामुमो उन दो सीटों पर कथित ‘दोस्ताना’ संघर्ष करने जा रही है जिन पर पिछली बार कांग्रेस जीती थी.

फिर भी यह लगता है कि यह व्यापक गठबंधन चुनावी मुकाबलों की तस्वीर को एकदम बदल देगा.

अगर इस गठबंधन को 1999 में इसकी पार्टियों को मिले वोटों जितना मत भी मिला तो भाजपा चार सीटों का नुकसान पाकर सात सीटों पर आ जाएगी.

अगर भाजपा को दो फीसदी वोटों का नुकसान हुआ तो उसकी सिर्फ पाँच सीटें रहेंगी.

अगर नुकसान चार फीसदी का हुआ तो सीटों की संख्या तीन रह जाएगी.

अब अगर यह गठबंधन सिर-फुटौव्वल का शिकार न हो जाए या फिर भाजपा कोई चमत्कार ही न कर दे तो इस राज्य में उसे हैरान करने वाले नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.

एक अन्य कारण है जो सारे गणित को बिगाड़ सकता है.

एमसीसी, एमसीसीआई और पीडब्ल्यूजी जैसे नक्सली जमात भी अपनी भूमिका निभाएंगे.

चतरा, पलामू, हजारीबाग, सिंहभूमि और कुछ अन्य इलाकों में उनका बहुत प्रभाव है.

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