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हर राज्य का अपना है समीकरण

मिज़ोरम में मतदान
पूर्वोत्तर राज्यों में काँग्रेस को नुक़सान हो सकता है
इन सात राज्यों में से सिक्किम में इस बार लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव भी होंगे.

1994 में विधानसभा चुनाव में इस राज्य का अपना मंडल आंदोलन सामने आया और पवन कुमार चामलिंग के नेतृत्व वाले सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने नर बहादुर भंडारी की सिक्किम संग्राम परिषद को परास्त कर दिया.

पारंपरिक सामंत वर्ग के शासन की जगह नेपाली भाषी पिछड़े और कमज़ोरों का प्रतिनिधित्व करने वाले चामलिंग विजयी हुए.

उसके बाद हुए सारे विधानसभा और लोकसभा चुनाव में यही मोर्चा जीता है और इसने केन्द्र के एनडीए से दोस्ती भी कर ली है.

इस दोस्ती के चलते ही चामलिंग अनेक नए समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने में कामयाब हुए हैं और संभव है कि इस चुनाव में वे इस चीज का लाभ लें.

सिक्किम संग्राम परिषद भी कमजोर नही हुई है और वह दस साल के फ्रंट के शासन से पैदा नाराज़गी का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेगी.

 सिक्किम संग्राम परिषद कमजोर नही हुई है और वह दस साल के सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के शासन से पैदा नाराज़गी का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेगी
योगेंद्र यादव

पहले कांग्रेस राज्य में तीसरी शक्ति के रूप में मौजूद थी, भले ही उस समय भी वह बहुत मजबूत न रही हो पर अब उसकी वह हैसियत भी नहीं बची है.

अरुणाचल प्रदेश

सिक्किम से उलट अरुणाचल प्रदेश में सत्तर के दशक से ही कांग्रेस सबसे मज़बूत राजनीतिक खिलाड़ी रही है. यही वो समय था जब प्रदेश अस्तित्व में आया था.

शुरू में यहां क्षेत्रीय दल बनाने के प्रयास हुए पर वे सफल नहीं हुए और कांग्रेस ही प्रभावी रही.

1999 के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री गेगोंग अपांग की बगावत से भी ख़ास फ़र्क नहीं पड़ा और कांग्रेस से अकेले गेगोंग अपांग ही जाते.

पर पिछले साल वे कांग्रेस से बड़े पैमाने पर दलबदल कराने में सफल रहे और उन्होंने अरुणाचल कांग्रेस की सरकार बना ली.

फिर उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करा दिया.

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अरुणाचल कांग्रेस के भाजपा में विलय से भाजपा वहाँ खाता खोल सकती है

इसके पीछे कोई वैचारिक आग्रह न होकर दिल्ली की सत्ता से अच्छा समीकरण रखने की इच्छा ही प्रमुख थी.

अब इस विलय के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता पर यह याद रखने वाली बात है कि अरुणाचल में स्थानीय कबीले हिंदू मुख्य धारा में सबसे ज़्यादा आसानी से आए हैं और यहाँ हिंदी का चलन पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा है.

पर अरुणाचल कांग्रेस के भाजपा में विलय से इस बात की संभावना ज़रूर वास्तविक बन गई है कि पूर्वोत्तर में वह अपना खाता खोल दे.

मेघालय

राष्ट्रीय राजनीति में पीए संगमा के महत्व और हाल में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से अलग होकर पूर्वोत्तर जन मंच बनाने की उनकी कोशिशों का बाकी जगह खास मतलब न हो पर उनके गृह प्रदेश मेघालय में असर है.

वैसे हाल में उनके फैसलों से उनका कद घटा है और अपने पुराने चुनाव क्षेत्र तुरा में भी उनकी परेशानियाँ बढ़ी हैं.

 संगमा की पूर्वोत्तर जन मंच बनाने की कोशिशों का बाकी जगह चाहे ख़ास मतलब न हो पर उनके गृह प्रदेश मेघालय में असर है
योगेंद्र यादव

राज्य की दूसरी सीट शिलांग में कांग्रेस अभी भी मजबूत है पर इस बार उसे पहले की तुलना में ज़्यादा मजबूत चुनौती मिल रही है.

पूर्वोत्तर के अन्य सभी राज्यों में हाल में चुनाव हुए हैं और वहाँ लोकसभा के परिणाम बहुत अलग नहीं होंगे.

मिज़ोरम, त्रिपुरा

मिज़ोरम में दिसंबर 2003 के चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट जीता था और अब भी उसे बढ़त दिख रही है.

बदनाम ललथनहवला को आगे रखने का कांग्रेस को नुक़सान हुआ.

त्रिपुरा में थोड़े अलग तरह से चुनाव होते हैं क्योंकि पूर्वोत्तर के राज्यों में यहां सबसे कम आदिवासी आबादी है- यहां बंगलाभाषी 69 फीसदी हैं तो आदिवासी सिर्फ 31 फीसदी.

यही कारण है कि माकपा ने पिछले तीन चुनावों में लोकसभा की दोनों सीटें जीती हैं.

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मीतेई और नागा कबीले की लड़ाई में पूरा प्रदेश धधक उठा था

आदिवासियों में माकपा की तुलना में ज्यादा आधार रखने वाली कांग्रेस अभी भी पीछे ही लग रही है.

इस बार आदिवासियों के संगठन ने भाजपा से हाथ मिलाया है पर इससे चुनावी नतीजों पर खास असर नहीं होगा.

नगालैंड, मणिपुर

नगालैंड में भी इस बार भाजपा, जनता दल (यू) और नागालैंड पीपुल्स कौंसिल का बड़ा अजीबोगरीब गठबंधन हुआ है.

पर इसी गठजोड़ ने 2003 में हुए चुनाव में एससी ज़मीर के नेतृत्व वाली कांग्रेसी सरकार को चित्त कर दिया था.

पिछली बार यहाँ की संसदीय सीट कांग्रेस ने जीती थी, पर वह बीते दिनों का किस्सा है.

मणिपुर में भी पिछले लोकसभा चुनाव के बाद स्थितियाँ एकदम बदल गई हैं और यह नगालैंड की शांति वार्ता से जुड़ी है.

मीतेई और नागा कबीले की लड़ाई में पूरा प्रदेश धधक उठा था.

उसेक बाद हुए 2002 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सरकार बना ली और मणिपुर स्टेट कांग्रेस हार गई.

इस बार कांग्रेस और भाकपा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

मणिपुर स्टेट कांग्रेस के सांसद ने इस बार भाजपा की सदस्यता ले ली है पर उन्हें काफी विरोध झेलना पड़ रहा है.

यहां बहुकोणीय मुकाबले के आसार हैं और नतीजे चौंका सकते हैं.

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