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शुक्रवार, 10 मार्च, 2006 को 10:52 GMT तक के समाचार
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सेल्युलर जेल की 100वीं वर्षगांठ

सेल्युलर जेल
सेल्युलर जेल को अब एक राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान काला पानी के नाम से कुख्यात अंडमान निकोबार द्वीप में स्थित सेल्युलर जेल 10 मार्च को अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रहा है.

इस अवसर पर जेल में एक आयोजन हुआ है जिसमें भारत सरकार की ओर से उन स्वाधीनता सेनानियों को सम्मानित किया गया जिन्हें इस जेल में रखा गया था.

साथ ही एक विशेष लाइट एंड साउंड शो भी हुआ जिसमें उन स्वाधीनता सेनानियों की क़ुर्बानियों को याद किया गया जो आज़ादी के लिए लड़े और काले पानी की सज़ा चुपचाप काटी.

 देश के सभी बच्चों को इस जेल को देखने आना चाहिए ताकि उनको अपनी स्वतंत्रता की कीमत का अहसास हो सके
कार्तिक सरकार, स्वाधीनता सेनानी

इसके अलावा जेल की स्थापना-शती के मौक़े पर वहाँ एक संगीतमय प्रस्तुति भी हुई जिसमें गायिका शुभा मुदगल ने स्वाधीनता सेनानियों की गाथा को याद किया.

अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में स्थित सेल्युलर जेल अब एक राष्ट्रीय स्मारक बन चुका है.

जेल की सलाखों के पीछे छह साल गुज़ारनेवाले कार्तिक सरकार ने कहा,"देश के सभी बच्चों को इस जेल को देखने आना चाहिए ताकि उनको अपनी स्वतंत्रता की कीमत का अहसास हो सके".

काला पानी

सेल्युलर जेल
698 छोटे कमरों में रखा जाता था क़ैदियों को

1896 से 1906 के बीच बनी सेल्युलर जेल में 698 कमरे हैं जिनमें स्वाधीनता की लड़ाई करनेवाले सेनानियों को बंद रखा गया था.

बंदियों को केवल साढ़े चार मीटर लंबे और तीन मीटर चौड़े कमरों में रखा जाता था.

बंदियों को तब भारत पर राज करनेवाले ब्रितानी शासकों ने जिस तरह की यातनाएँ दी थीं उसके कारण इस जेल का नाम काला पानी पड़ गया था.

इस जेल में अधिकतर बंदी ऐसे थे जिन्होंने ब्रितानी राज से लोहा लेने के लिए महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते से अलग विद्रोह का रास्ता अपनाया था.

काले दिन की यादें

 यहाँ सज़ा काटना मौत की सज़ा के बराबर था. बंदियों के साथ होनेवाले बर्ताव के विरोध में हमने यहाँ एक महीने तक अनशन किया था
बिमल भौमिक, स्वाधीनता सेनानी

सेल्युलर जेल में भेजे गए बंदियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोग बंगाल के रहनेवाले थे.

पश्चिम बंगाल में रहनेवाले 92 वर्षीय बिमल भौमिक को ब्रिटिश सरकार ने 1937 में काले पानी की सज़ा दी थी.

भौमिक बताते हैं,"यहाँ सज़ा काटना मौत की सज़ा के बराबर था. बंदियों के साथ होनेवाले बर्ताव के विरोध में हमने यहाँ एक महीने तक अनशन किया था".

उन्होंने बताया कि ब्रितानी शासकों ने ज़बरदस्ती उनकी हड़ताल को तोड़ना चाहा लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी के आग्रह के बाद ही भूख हड़ताल ख़त्म की.

पर्यटन के लिए अंडमान निकोबार आईं एक महिला पर्यटक नमिता दास का मत है,"ये एक तीर्थ है और सभी भारतीयों को मंदिर-मस्जिद जाने के बजाय यहाँ आना चाहिए".

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