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शहीदों के रिश्तेदारों का अनूठा मिलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा. दूसरी निशानियाँ परिवार के रिश्तों नातों की, जो अक्सर इन शहीदी मेलों का हिस्सा नहीं होतीं. भारत में 1857 के ग़दर के सेनानी रामचंद्र पांडुरंग योलेकर उर्फ़ तात्या टोपे की बरसी पर इस बार 18 अप्रैल को मध्यप्रदेश के शहर शिवपुरी में इन शहीदों के रिश्ते-नातेदार मौजूद होंगे जहाँ तात्या टोपे को फाँसी दी गई थी. अमरीकी शहर सैन फ्रांसिस्को से लेकर दिल्ली और महाराष्ट्र के योएला से टोपे परिवार के तक़रीबन 150 सदस्य उनकी पुण्यतिथि पर शिवपुरी पहुँच रहे हैं. तात्या टोपे के पड़पोते राजेश टोपे एक पुरानी तस्वीर दिखाकर कहते हैं कि परिवार का एक ऐसा ही मिलन 75 साल पहले योएला में हुआ था जो रामचंद्र पांडुरंग योलेकर की जन्मस्थली है. परिवार के बुज़ुर्ग बालचंद शंकर कहते हैं कि कानपुर में जब ग़दर की चिंगारी भड़की तब से लेकर अंत तक ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौजों से लड़ने वाले तात्या टोपे के परिवार के लिए लंबे समय तक ऐसा मिलन एक सपना था. बालचंद शंकर कहते हैं, "ब्रितानी फ़ौजों ने परिवार के लोगों को इतना परेशान किया कि परिवार के काफ़ी सदस्यों ने अपने नाम और पेशे बदल दिए थे, औरतें मराठी कपड़ों की बजाय मुस्लिम महिलाओं की तर्ज़ के कपड़े पहनने लगीं थीं." बालचंद शंकर का परिवार उस समय ग्वालियर इलाक़े में रह रहा था और उन जैसों के परिवारों को सिर्फ़ अंग्रेज़ों से ख़तरा नहीं था बल्कि सिंधिया जैसे राजघरानों से भी था जिन्होंने भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कही जाने वाली क्रांति में अंग्रेज़ों का साथ दिया था. उन्हें नारवार के राजा मानसिंह जैसे लोगों से भी ख़तरा था जो एक लंबे समय तक बुंदेलखंड और नर्मदा के इलाक़ों में तात्या टोपे के साथ मिलकर लड़े लेकिन बाद में धोखे से उन्हें अंग्रेज़ों के हाथों गिरफ़्तार करवा दिया. 18 अप्रैल 1859 में तात्या टोपे को शिवपुरी जेल की बैरक नंबर चार में फाँसी दे दी गई थी. ग़दर का सिपाही तात्या टोपे को फाँसी दिए जाने से लगभग एक साल पहले मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की ग़िरफ़्तारी के साथ ही 1857 के विद्रोहियों और अंग्रेज़ी फ़ौजों की सीधी लड़ाई ख़त्म हो गई थी लेकिन उसके बाद भी तात्या टोपे ने शिवाजी की गुरिल्ला युद्ध प्रणाली अपनाकर भारत के मध्य भाग के कुछ हिस्सों में ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी रखा. कहते हैं कि उनकी ग़िरफ़्तारी के साथ ही 1857 की लड़ाई ख़त्म हो गई थी.
शिवपुरी में मनाई जाने वाली उनकी बरसी पर न सिर्फ़ टोपे परिवार बल्कि रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और दूसरे शहीद सिपाहियों के ख़ानदान वालों के भी आने की उम्मीद है. इस आयोजन से जुड़े और 1857 पर शोध संस्थान चलाने वाले रूप किशोर वशिष्ठ कहते हैं कि चाहे महात्मा गाँधी हों या सुभाष चंद्र बोस या फिर उनसे पहले की आज़ादी की लड़ाइयाँ, सभी 1857 की क्रांति से प्रेरित थे जिसने भारतवासियों को स्वतंत्रता का सपना दिया, इस भावना को प्रत्येक भारतीय तक पहुँचाना ज़रूरी है. गोली से फाँसी तक ज्वाला आज धधकती जाती है, वीरों की क़ुर्बानी ने भारत का नक़्शा खींचा है, खंडित न हो नक़्शा ए गुलशन आज तुझे चेताती है, | इससे जुड़ी ख़बरें जिनके लिए तिरंगा भगवान है14 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस आज़ादी के 58 साल बाद स्वतंत्रता सेनानी माना20 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस रेसीडेंसी संग्रहालय में एक नई गैलरी16 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस नष्ट हो रही है गाँधी जी की धरोहर02 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस अन्याय और दुर्दशा ही जिनकी नियति है13 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस नेहरु-गांधी परिवार का आनंद भवन30 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस और भी बहुत कुछ लिखा है बंकिम चंद्र ने04 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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