| ऐतिहासिक इमारतें और धर्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शाहजहाँ ने जब ताजमहल बनवाया था तो सरकारी दस्तावेज़ों में इसके बारे में एक बादशाहनामा दर्ज किया गया था. उसने आगरा के आसपास के 80 गाँवों का एक वक्फ़ यानी ट्रस्ट बनाया था. इन गाँवों से लगान आदि के रुप में होने वाली आय से ताजमहल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे. उस समय की व्यवस्था के अनुसार ताजमहल का मुतवल्ली यानी मैनेजर मुग़ल बादशाह को नियुक्त किया गया था. इस लिहाज़ से देखें तो इस पर दो दृष्टिकोण हो सकते हैं. एक तो ये कि ताजमहल उसी के अधिकार में रहेगा जिसकी हुकूमत होगी, और दूसरा ये कि इसे किसी सरकारी वक्फ़ बोर्ड को दे दिया जाए. क़ानून लेकिन इसके लिए कोई भी क़दम प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम के तहत उठाना ज़्यादा अच्छा होगा. यह अधिनियम पहले 1904 में बना था और 1958 में इसमें संशोधन किया गया. इस क़ानून के अनुसार जिन स्मारकों का उस समय सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था वही स्थिति अब भी जारी रहनी चाहिए. और जहाँ तक ऐतिहासिक स्मारकों का सवाल है तो वहाँ धर्म का सवाल ही नहीं है. क़ानून में कहा गया है कि जिन स्मारकों में पूजा पाठ नहीं होता उसे इसके लिए नहीं खोला जा सकता. ये और बात है कि सरकार ने ख़ुद इस क़ानून को तोड़ा और 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया. जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने इस पर अपना दावा जताया था तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को इसे हाईकोर्ट में चुनौती देनी चाहिए थी. और यदि शिया-सुन्नी का सवाल आएगा तो यह भी तो पूछा जाएगा कि मुमताज महल शिया थीं या सुन्नी. वह चूँकि वह ख़ुद शिया परिवार से थीं इसलिए तो वे शिया ही हुईं.... (सीमा चिश्ती से हुई बातचीत पर आधारित) |
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