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ताज अपने नाम करने की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में प्रेम की निशानी के रुप में मशहूर 350 बरस पुराना ताजमहल एक और विवाद में घिर गया है. अब उत्तर प्रदेश के सुन्नी मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड ने ताजमहल को अपनी संपत्ति के रुप में दर्ज करने के आदेश दिए हैं, हालाँकि बोर्ड ने यह भी कहा है कि फ़िलहाल इसकी देखरेख की ज़िम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ही रहेगी. उधर पुरातत्व सर्वेक्षण ने कहा है कि वक्फ़ बोर्ड के इस फ़ैसले को चुनौती दी जाएगी. यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब विश्व धरोहर समिति की डरबन में बैठक चल रही है और ताज महल को युनेस्को ने विश्व धरोहर भी घोषित कर रखा है. वक्फ़ बोर्ड ने यह आदेश आगरा में रहने वाले इरफ़ान बेदार की याचिका पर दिया है जो ख़ुद ताजमहल के मुतवल्ली या मैनेजर बनना चाहते हैं. इस आदेश के तहत यदि ताजमहल को वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति के रुप में दर्ज कर लिया जाता है तो ताज महल में पर्यटकों से होने वाली आय का साढ़े सात प्रतिशत हिस्सा बोर्ड को चला जाएगा. बोर्ड के चेयरमैन मोहम्मद हाफ़िज उस्मान ने कहा है कि इस राशि का उपयोग शाहजहाँ की वसीयत के मुताबिक़ सांस्कृतिक आयोजनों में किया जा सकेगा. ग़ौरतलब है कि ताज महल में पर्यटकों के आने से हर साल करोड़ों की आय होती है. याचिका ताजमहल को सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति घोषित करने और ख़ुद को वहाँ का मैनेजर नियुक्त करने की गुज़ारिश करते हुए इरफ़ान बेदार ने 1998 में बोर्ड के सामने एक याचिका दायर की थी.
इस याचिका पर लंबे समय तक सुनवाई न होने पर इरफ़ान बेदान ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया. उच्च न्यायालय ने नवंबर, 2004 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को निर्देश दिए कि वह इस संबंध में फ़ैसला ले. न्यायालय के इस निर्देश के आधार पर सेंट्रल सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने आदेश दिया है कि ताज महल को वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति दर्ज किया जाए. ध्यान देने की बात है कि उत्तर प्रदेश में सारी क़ब्रों पर सुन्नी वक्फ़ बोर्ड का हक़ है और इसी के तहत वह ताजमहल को भी अपनी संपत्ति मान रहा है क्योंकि ताजमहल भी मुमताज महल की क़ब्र है. हालाँकि बोर्ड ने इरफ़ान बेदार को मैनेजर बनाने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं दिया है और इसी से नाराज़ बेदार ने कहा है कि वह बोर्ड के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ फिर से उच्च न्यायालय का दरवाज़ खटखटाएंगे. इसके अलावा आख़िरी मुगल शासक बहादुर शाह ज़फ़र के कथित वंशज के रुप में प्रिंस याक़ूब ने भी एक याचिका दायर करके कहा था कि ताजमहल उनकी संपत्ति है और उन्हें दी जानी चाहिए. वह इस समय हैदराबाद में रहते हैं. अभी इस मामले की भी सुनवाई होनी है. आधार वक्फ़ अधिनियम 1995 के तहत उत्तर प्रदेश की सारी क़ब्रों पर वक़्फ़ बोर्ड का अधिकार है और ताजमहल भी एक क़ब्र ही है जिसमें मुमताज महल को दफ़नाया गया था. सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने अपने फ़ैसले में कहा है कि इसी अधिनियम के आधार पर ताजमहल, इससे जुड़ी मस्जिद, जमातख़ाना और अन्य मक़बरे वक्फ़ की संपत्ति है. बोर्ड ने आदेश दिए हैं कि इस अधिनियम के तहत बोर्ड के सभी अभिलेखों में ताजमहल को उसकी संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया जाए. हाफ़िज़ उस्मान ने अपने फ़ैसले में कहा है कि इस बारे में आगे चर्चा के लिए भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों के साथ एक बैठक करने के भी आदेश दिए हैं. राजनीति पिछले दो सालों से विवादों का सामना कर रहे ताजमहल को लेकर यह नया विवाद है.
इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में ताजमहल के आसपास बाज़ार बनाने की कोशिश को लेकर विवाद हुआ और मामला अदालत में है. इसके बाद ताजमहल की मीनारों के झुकने का विवाद हुआ और इसके लिए भी एक समिति बना दी गई. फिर ताजमहल की 350 वीं वर्षगाँठ पर आयोजनों को लेकर राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच खींचतान चलती रही. इस फ़ैसले पर विवाद इसलिए भी होने वाला है क्योंकि बोर्ड के चेयरमैन मोहम्मद हाफ़िज उस्मान समाजवादी पार्टी के सदस्य हैं और उनकी नियुक्ति भी राज्य की समाजवादी पार्टी सरकार ने की है. उन्होंने कहा है कि ताजमहल को लेकर आगे की कार्रवाइयों का फ़ैसला मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सलाह से लिया जाएगा. इसका मतलब यह है कि ताजमहल के मामले में अब उत्तर प्रदेश सरकार का भी दख़ल हो जाएगा. विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी पहले से ही दावा करते रहे हैं कि ताजमहल एक पुराना मंदिर था. |
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