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वाम दलों ने अमरीका की आलोचना की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने आरोप लगाया है कि अमरीका परमाणु क़रार को स्वीकार करने के लिए भारत पर दबाव बना रहा है. वाम दलों की प्रतिक्रिया भारत में अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़ोर्ड के बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि असैनिक परमाणु सहयोग समझौते को मंज़ूर करने के लिए भारत के पास आख़िरी अवसर है नहीं तो समझौता रद्द होने का ख़तरा है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता डी राजा ने कहा कि भारत एक संप्रभु देश है जहाँ एक सशक्त संसद मौजूद है और इसलिए किसी फ़ैसले पर पहुँचने के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता. डेविड मलफ़ोर्ड ने कहा है कि अगर मौजूदा अमरीकी संसद से समझौते को अंतिम मंज़ूरी नहीं मिली तो इस बात की संभावना कम ही है कि दोबारा भारत को इस तरह का अवसर मिले. उनकी इस टिप्पणी को डी राजा ने धमकी की संज्ञा दी और कहा कि अमरीका इस समझौते के भारत में कारोबार की संभावना तलाश रहा है. सीपीआई नेता ने कहा कि भारत स्वदेशी तकनीक से परमाणु ईंधन विकसित कर रहा है और यूरोनियम के विकल्पों की तलाश हो रही है. फॉरवर्ड ब्लॉक ने मलफ़ोर्ड पर भारत को 'धमकाने' का आरोप लगाते हुए कहा है कि अमरीका के साथ किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। पार्टी के नेता देवब्रत विश्वास ने कहा कि अगर केंद्र सरकार परमाणु समझौते के क्रियान्वयन के लिए ज़रूरी 1-2-3 समझौते को अंतिम रूप देती है तो वो यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे. अमरीकी रूख़ डेविड मलफ़ोर्ड के अलावा अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा था कि परमाणु समझौते पर समय बर्बाद हो रहा है क्योंकि अमरीका में यह वर्ष राष्ट्रपति चुनावों का है. अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़ोर्ड ने एक निजी समाचार चैनल से कहा कि यह समझौता भारत के हित में है और इससे वह दुनिया में असैनिक परमाणु उद्योग के केंद्र में होगा.
उन्होंने कहा, "अगर इसे मौजूदा अमरीकी कॉंग्रेस से अंतिम मंज़ूरी नहीं मिली तो इसकी संभावना कम है कि भारत को इस समझौते की पेशकश दोबारा की जाएगी. तब निश्चित रूप से समझौते को वर्ष 2010 तक पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता चाहे सत्ता में डेमोक्रैटिक या रिपब्लिकन पार्टी आए." मलफ़ोर्ड का कहना है कि समझौता दोबारा तैयार करने पर इसे फिर से कॉंग्रेस की समिति से होकर गुजरना होगा और तब परमाणु अप्रसार के लिए काम करने वाले संगठन रियायतों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर सकते हैं. वो कहते हैं, "मैं समझता हूँ कि माहौल बदल रहा है और इसलिए मेरा मानना है कि अमरीका में डेमोक्रैट और रिपब्लिकन दोनों मानते हैं कि समझौते को अभी पूरा कर लिया जाए." |
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