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आदमखोर बाघों का आंतक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुंदरबन के घने जंगलों के किनारे पर बसा एक गाँव आदमखोर बाघों से इस क़दर परेशान हैं कि लोग रातों को सोते नहीं हैं. सुंदरबन अपने रॉयल बंगाल टाइगर के लिए भी जाना जाता है. यहाँ इनकी संख्या साढ़े तीन सौ के आसपास है. जंगलों के नष्ट होने से इन जानवरों का आवास ख़तरे में है और ये जानवर भोजन की तलाश में गांवों में भी आ जाते हैं. ऐसा ही एक गांव है चांदपाई. चांदपाई गाँव किसी भी अन्य गाँव जैसा ही दिखता है. चहल पहल, रिक्शा, नाव में आते जाते लोग लेकिन शाम के बाद यहां मरघट जैसी शांति छा जाती है. लोग बाहर नहीं निकलते हैं. गाँव के निवासी तारिक़ कहते हैं, “हम रात में बाहर नहीं निकलते. मचान बना कर वहीं सोते हैं. क्योंकि बाघ आता है. गाय, बकरी, मुर्गी, भेड़ उठा कर ले जाता है. हमें बहुत डर लगता है. गाय बकरी के बाद तो बच्चों को उठा ले जाएगा ये बाघ.” चांदपाई में बाघों और मनुष्यों का संघर्ष पुराना है. यहां बाघों के संरक्षण के लिए काम कर रहे ब्रितानी नागरिक एडम बर्लो यहां होने वाली घटनाओं के बारे में बताते हैं, “ ये सुंदरबन के उन इलाक़ों में है जहां बाघ और मनुष्यों का संघर्ष होता है. हमारी जानकारी के अनुसार एक बाघ है जो पिछले कई दिनों से हमले कर रहा है. 50 जानवर ले गया है ये बाघ और बाघ ने एक बूढ़ी महिला को भी मार डाला है. हमारी कोशिश है नहर किनारे बाड़ लगाकर उसे रोकने की.” ‘मामू’ बाघों को यहां स्थानीय लोग सम्मान से या कहिए डर से मामू कहते हैं जी हां मामू जो एक संबंध का भी परिचायक है. बर्लो बताते हैं कि सुंदरबन के बाघों में आदमखोर होने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है. जिसके कई कारण हो सकते हैं.
बर्लो कहते हैं, “कभी बाघ बीमार होता है या घायल होता है तो गांवों में शिकार उसके लिए आसान हो जाता है. बूढ़ा बाघ या फिर जिसके दांत कमज़ोर हों उनके आदमखोर होने की संभावना बढ़ जाती है.” चांदपाई गांव में बाघ ने एक महिला को भी मार डाला है. मृतक महिला की सास मैना मंडल कहती हैं कि उनकी सास रात में बाहर सोई थीं जब उन्हें बाघ उठा कर ले गया. आवाज़ सुनने पर घर के लोग निकले तो बाघ ने महिला को छोड़ तो दिया लेकिन महिला बची नहीं. एक और महिला बहुत डरी हुई थीं. वो कहती हैं, “ रात में आता है बाघ. मेरी छह बकरियाँ ले गया. हमने उसकी गुर्राहट सुनी थी. हम डर से छिप गए थे. बगल वाले घर से भी तीन-चार दिन बाद कुछ जानवरों को बाघ ले गया.” गांव के अधिकतर लोगों की कहानी लगभग ऐसी ही है. बांग्लादेश में हर साल बाघ और मनुष्यों के संघर्ष में 50 से 100 लोग और कम से कम तीन से चार बाघ मारे जाते हैं. इन संघर्षों को रोकना मुश्किल कार्य है क्योंकि जंगल समाप्त हो रहे हैं. ऐसी समस्याओं के निदान के लिए दूरगामी नीतियों की ज़रुरत है. बाड़ बनाकर या गोलियां चलाकर ये संघर्ष रोकना मुश्किल है. |
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