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मंगलवार, 06 फ़रवरी, 2007 को 11:26 GMT तक के समाचार
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उदासीनता के गर्त में डूबता सुंदरबन

सुंदरबन
सुंदरबन पर मँडरा रहे ख़तरे से भारी संख्या में लोग प्रभावित होंगे
पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच स्थित सुंदरबन डेल्टा अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है.

दुनिया के सबसे बड़े नदी डेल्टा के टापू बहुत तेज़ी से डूबते जा रहे हैं.

समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया में रॉयल बंगाल टाइगर के इस सबसे बड़े घर और समुद्री दलदली जंगल (मैंग्रोव फॉरेस्ट) पर मंडराता संकट लगातार गहरा होता जा रहा है.

वैसे तो पहले भी समय-समय पर सुंदरबन के द्वीपों के पानी में समाने पर चिंताएँ जताई जा रहीं थी लेकिन संयुक्त राष्ट्र की ओर से हाल में जारी पर्यावरण रिपोर्ट के बाद अब इसकी गंभीरता खुलकर सामने आ गई है.

 समुद्र के बढ़ते जलस्तर और प्रशासनिक उदासीनता के कारण वर्ष 2020 तक सुदंरबन का 15 फ़ीसदी इलाक़ा समुद्र में समा जाएगा.
डॉ सुगत हाजरा

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्र का जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो सुंदरबन जल्दी ही भारत के नक़्शे से मिट जाएगा. वैसे भी हाल में लोहाचारा नामक द्वीप पानी में समा चुका है.

वैसे, सुंदरवन के वजूद पर छाए संकट की बात की चर्चा पहले भी हो चुकी है. लेकिन सरकार ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया.

कोलकाता स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय के समुद्रविज्ञान अध्ययन विभाग के प्रमुख डॉ सुगत हाजरा बीते छह वर्षों से अपनी टीम के साथ सुंदरबन पर मँडराते पर्यावरण ख़तरे का अध्ययन कर रहे हैं.

बढ़ता जलस्तर

हाजरा कहते हैं, “समुद्र के बढ़ते जलस्तर और प्रशासनिक उदासीनता के कारण वर्ष 2020 तक सुदंरबन का 15 फ़ीसदी इलाक़ा समुद्र में समा जाएगा. यहाँ बीते दस वर्षों से समुद्री जलस्तर सालाना 3.14 मिमी की दर से बढ़ रहा है. इससे कम से कम 12 द्वीप संकट में हैं.”

सुंदरबन इलाक़े में कुल 102 द्वीप हैं. इनमें से 54 पर आबादी है. इन लोगों में किसानों, मछुआरों और मज़दूरों की तादाद ज़्यादा है.

हाजरा कहते हैं, “अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से भी हमारे अध्ययन की पुष्टि हो गई है. अगर सरकार ने समय रहते इन द्वीपों को बचाने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो नतीज़े गंभीर हो सकते हैं.”

इस इलाक़े में बड़े पैमाने पर होने वाले भूमि कटाव से लगभग 10 हज़ार लोग बेघर हो गए हैं. इनको ‘पर्यावरण के शरणार्थी’ कहा जा रहा है. हाजरा के मुताबिक, अगले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे शरणार्थियों की तादाद 70 हज़ार तक पहुँच जाएगी.

अब वह घोड़ामारा द्वीप ख़तरे में है जहाँ दो सौ साल पहले सुंदरबन इलाक़े में सबसे पहली ब्रिटिश चौकी की स्थापना की गई थी. इसका एक तिहाई हिस्सा समुद्र में समा चुका है.

घोड़ामारा के विश्वजीत दास कहते हैं, “मेरे पास तीन हेक्टेयर खेत थे. लेकिन अब महज एक हेक्टेयर बचा है. इसके भी पानी में डूब जाने के बाद हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा.” उस द्वीप के ज्यादातर लोगों की कहानी मिलती-जुलती है.

चुनौती

गैर-सरकारी संगठन ‘हेल्प टूरिज्म’ के असित विश्वास और डॉ हाजरा कहते हैं कि "सुंदरवन की इस हालत के लिए इंसान भी जिम्मेवार हैं. 1990 के मध्य तक लोगों ने इलाक़े के सुंदरी वनों को भारी नुकसान पहुंचाया. लेकिन दोबारा उन पेड़ों को रोपने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया."

 हमने संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है. हमारे वैज्ञानिक भी बीते कुछ वर्षों से सुंदरवन में पर्यावरण असंतुलन के कारण होने वाले बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं
कांति गांगुली

विश्वास कहते हैं, “इलाक़े में पर्यटन को बढ़ावा देकर लोगों को रोज़गार के वैकल्पिक साधऩ मुहैया करा कर ही वहां की दुर्लभ वनस्पतियों को बचाया जा सकता है. इसके बिना लोग पेड़ काटते रहेंगे.”

एक अन्य संगठन ‘सेव सुंदरवन’ ने भी समुद्र के खारे पानी से वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुँचने की बात कहते हुए लोगों को किसी वैकल्पिक स्थान पर स्थानांतरित करने की माँग की है.

राज्य के अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक अतनू राहा कहते हैं कि आबादी के दबाव ने सुंदरवन के जंगलों को भारी नुकसान पहुंचाया है और इलाक़े के गाँवों में रहने वाले लोगों के चलते जंगल पर काफी दबाव है.

उनका कहना है, "इसे बचाने के लिए एक ठोस पहल की ज़रूरत है ताकि जंगल के साथ-साथ वहाँ रहने वाले लोगों को भी बचाया जा सके. हमने इलाक़े में बड़ी नहरें व तालाब खुदवाने का फैसला किया है ताकि बारिश का पानी संरक्षित किया जा सके. इस पानी से इलाके में जाड़ों के मौसम में दूसरी फसलें उगाई जा सकती हैं. इससे जंगल पर दबाव कम होगा.”

डॉ हाजरा कहते हैं कि सरकार ने अगर तत्काल प्रभावी उपाय किए तो कई द्वीपों को डूबने से बचाया जा सकता है.

राज्य सरकार ने सुंदरबन के संरक्षण और विकास के लिए एक अलग मंत्रालय का गठन किया है.

सुंदरबन मामलों के मंत्री कांति गांगुली कहते हैं, “हमने संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है. हमारे वैज्ञानिक भी बीते कुछ वर्षों से सुंदरबन में पर्यावरण असंतुलन के कारण होने वाले बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं. सरकार परिस्थिति से वाकिफ़ है. हम जल्दी ही इस दिशा में ज़रूरी क़दम उठाएँगे.”

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