BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 10 अगस्त, 2005 को 06:00 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
गंगोत्री की काँवड़ यात्रा से चिंता

गंगोत्री
गंगोत्री में ग्लेशियर पिघलने को लेकर लंबे समय से चिंता की जा रही है
जब पर्यावरण की बात होती है तो तरह-तरह के प्रदूषण की बात होती है. इसमें औद्योगिक प्रदूषण की बात होती है और वाहनों की बढ़ती संख्या पर चिंता होती है.

इसके आधार पर कहा जाता है कि इन सबकी वजह से वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है और वायुमंडल के बड़ते तापमान को ग्लेशियर के पिघलने का कारण माना जाता है.

इसी के साथ पहाड़ों पर जाने वाले यात्रियों द्वारा फैलाए गए कचरे की चर्चा होती है लेकिन गंगा के उदगम गंगोत्री पर इन दिनों एक अलग तरह की चिंता है.

गंगोत्री में एकाएक काँवड़ यात्रा शुरु हो गई है और इसकी वजह से वहाँ कई तरह की चिंता पैदा हो गई है. एक धार्मिक यात्रा के पीछे पर्यावरण को कितना नुक़सान हो रहा है इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.

काँवड़ यात्रा

हिमालय की बर्फ से ढंकी ऊँची चोटियों के बीच, जैसे ही आप गंगोत्री से गोमुख की ओर जाने वाली संकरी पहाड़ी पगडंडियों पर चलना शुरू करते हैं, आपको समझ में आता है कि हमारे शास्‍त्रों में यह क्यों लिखा है कि सिर्फ़ सांसारिक दायित्वों से मुक्त होने पर ही चारधाम की यात्रा पर जाना चाहिए.

सैकड़ों मीटर नीचे बहती गंगा पर अगर एक नज़र डालें जिसके किनारे किनारे ऊँचे पहाडों पर यह पगडंडी चलती है तो सिर्फ़ एक बार पैर फिसलने से मत्यु की निश्चितता में कोई संदेह नहीं रह जाता.

गंगोत्री
पाँच-सात साल पहले कोई गंगोत्री में काँवड़ यात्रा नहीं करता था

पर सांसारिक दायित्वों से मुक्त होना तो दूर इन दायित्वों के शुरू होने के पहले ही लाखों की तादाद में भारत का युवा इन दिनों गोमुख पहुंचने लगे हैं.

गोमुख की काँवड़ यात्रा भारत के धार्मिक पर्यटनों में नवीनतम जुड़ाव है.

ठीक उसी तरह जिस तरह टीसीरीज़ के गुलशन कुमार ने अपने भजनों के वीडियो से जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर को नया तीर्थ बना दिया.

हालांकि गुलशन कुमार की तरह इस यात्रा के आविष्कारकर्ता इतने लोकप्रिय नहीं हैं.

स्थानीय लोग कहते हैं कि हरियाणा में रहने वाले एक फ़ौजी अफसर ने कथित रुप से यह सपना देखा था कि वह यदि गोमुख में जल भरकर उसे पैदल अपने गांव के शिवलिंग में चढ़ाए तो उसकी मनोकामना पूरी होगी.

इस अफसर का नाम कोई नहीं बता पाता पर सभी यह कहते हैं कि आज से पाँच-सात साल पहले किसी ने गोमुख की काँवड़ यात्रा का नाम भी नहीं सुना था.

पर इस साल जुलाई के महीने में देश के विभिन्न हिस्सों से एक लाख से अधिक युवा काँवड़ियों ने गोमुख की यात्रा की और यहाँ से ले जाकर शिवरात्रि के दिन अपने गांव के शिवलिंग पर जल चढ़ाया.

काँवड़ यात्रा से चिंता

लेकिन यह मामला सिर्फ़ गंगोत्री तक की यात्रा और जलाभिषेक का नहीं है. इसके अलावा जो कुछ हो रहा है उसने लोगों को बेहद चिंतित कर दिया है.

इस काँवड़ यात्रा में एक परंपरा बन गई है कि यात्री गोमुख पर स्नान करने के बाद अपने पुराने वस्त्र वहीं छोड़ देता है.

 पिछले वर्ष काँवड़ यात्रा के बाद हमने स्वयंसेवकों के साथ मिलकर डेढ़ टन से अधिक वस्त्र इकट्ठे किए. हमने घोड़ों पर लाद-लादकर कचरे नीचे भेजे
स्वामी राघवेंद्रानंद

गंगोत्री के ईशावास्यम आश्रम के स्वामी राघवेंद्रानंद कहते हैं, "पिछले वर्ष काँवड़ यात्रा के बाद हमने स्वयंसेवकों के साथ मिलकर डेढ़ टन से अधिक वस्त्र इकट्ठे किए. हमने घोड़ों पर लाद-लादकर कचरे नीचे भेजे."

गोमुख के रास्ते पर जो ढाबे हैं काँवड़ यात्री उनका इस्तेमाल रात में रूकने के लिए इस्तेमाल करते हैं. नतीजा यह है कि इन ढाबों के आसपास आपको सिर्फ प्लास्टिक के बोतलें ही नज़र आएँगीं.

इसके अलावा गंगोत्री के आसपास भोजपत्रों के पेड़ बहुत हैं. पता नहीं क्यों काँवड़ यात्री इन पेड़ों की डाल तोड़-तोड़कर घर ले जाते हैं.

हर्षवंती बिष्ट पिछले काफी वर्षों से गंगोत्री के आसपास भोजपत्र के पेड़ों को बचाने का काम कर रही हैं. वे कहती हैं, "ये भोजपत्र वही वृक्ष हैं जिनकी छाल पर हमारे तमाम प्राचीन ग्रंथ लिखे गए. मुझे समझ में नहीं आता कि कोई धार्मिक व्यक्ति इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है?"

वे कहती हैं, "हम देख रहे हैं यह यात्रा अब धार्मिक कम और मौज मस्ती अधिक होती जा रही है."

सर्वोच्च न्यायालय के वकील एमसी मेहता कहते हैं, "मैंने कई लोगों को वहाँ गैस का चूल्हा इस्तेमाल करते हुए देखा. इन स्थानों को अगर हम देवभूमि कहते हैं तो हमें उनकी इज़्ज़त करना आना चाहिए."

गंगोत्री, धर्म और पर्यावरण

1866 में भारत आए ब्रितानी यात्री सैम्युएल बर्न अपनी किताब में लिखते हैं, "जब मैं गंगोत्री पहुंचा तो स्थानीय लोगों ने मेरे गोमुख तक जाने का विरोध किया."

बर्न के अनुसार स्थानीय यह मानते थे कि गंगा गंगोत्री पर ही उतरीं और किसी भी मनुष्य का गंगोत्री से आगे चलकर गोमुख तक जाना अधार्मिक है.

 पहले गंगोत्री ग्लेश्यिर में नौ छोटे ग्लेश्यिर आकर मिला करते थे आज उनकी संख्या पाँच रह गई है. मुझे डर है कि ऐसा ही चलता रहा तो इस सदी के अंत तक गंगा एक सदानीरा न होकर केवल एक मॉनसून पर आधारित नदी बनकर रह जाएगी
राजेश कुमार, ग्लेशियरॉलिस्ट

गंगोत्री पर ही गंगा का मंदिर है पर गंगा का उदगम स्थल अब पीछे खिसकते खिसकते 19 किलोमीटर दूर चला गया है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि 'आइस एज' की समाप्ति के बाद से ही गंगोत्री ग्लेश्यिर पिघलकर पीछे जा रहा है पर उनके अनुसार इस प्रक्रिया की गति 1970 के बाद से दुगुनी हो गई है.

उनका यह भी मानना है कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों का गोमुख तक जाना ग्लेश्यिर के स्वास्थ्य के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ग्लेश्यिरॉलॉजिस्ट राजेश कुमार कहते हैं, "पहले गंगोत्री ग्लेश्यिर में नौ छोटे ग्लेश्यिर आकर मिला करते थे आज उनकी संख्या पाँच रह गई है. मुझे डर है कि ऐसा ही चलता रहा तो इस सदी के अंत तक गंगा एक सदानीरा न होकर केवल एक मॉनसून पर आधारित नदी बनकर रह जाएगी."

विरोध

1866 की तरह आज भी स्थानीय लोग गोमुख की यात्रा का विरोध कर रहे हैं.

ग्लेश्यिर बचाओ आंदोलन की प्रमुख शांति ठाकुर कहती हैं जब गंगा मैया ही खत्म हो जाएँगी तब उस समय आपकी धार्मिकता का क्या होगा?

सर्वोच्च न्यायालय के वकील एम सी मेहता इस आंदोलन के बड़े समर्थक हैं.

 गंगोत्री के आसपास कम से कम दस इतनी ही सुंदर जगहें हैं यदि हम यात्रियों को इन दस स्थानों में बांट दें तो गंगा मैया भी बच जाएँगीं और हमारा रोज़गार भी चलता रहेगा
गोपाल बिष्ट, चाय की दुकानवाला

वे कहते हैं, "मैं पिछले दिनों गंगोत्री और अमरनाथ की यात्रा पर गया था और वहां मैंने जो भी देखा उससे मुझे बहुत दुख हुआ. इन स्थानों को बचाने के लिए हमें क़ानूनी सहित सभी लड़ाइयाँ लड़नी चाहिए."

गोपाल बिष्ट गोमुख के रास्ते पर चाय की दुकान चलाते हैं.

वे कहते हैं, "गंगोत्री के आसपास कम से कम दस इतनी ही सुंदर जगहें हैं यदि हम यात्रियों को इन दस स्थानों में बांट दें तो गंगा मैया भी बच जाएँगीं और हमारा रोज़गार भी चलता रहेगा."

लेकिन साधु संतों की राय कुछ और ही है.

स्वामी राघवेंद्रानंद कहते हैं, "इस काँवड़ यात्रा ने युवाओं को एक बार फिर धर्म की ओर आकृष्ट किया है इसलिए इस यात्रा का स्वागत किया जाना चाहिए."

वे कहते हैं, "हमारे शास्‍त्रों में लिखा है कि कलयुग में गंगा समाप्त हो जाएँगीं आप कुछ भी कर लीजिए आप उसे नहीं रोक सकते."

तय लोगों को करना है कि वे साधु संतों की बात मान कर गंगा के विलुप्त होने की प्रतीक्षा करें या पर्यावरणवादियों की चिंता में शामिल होकर लड़ाई शुरु करें.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>