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अब हो रही है पहाड़ की मरम्मत
उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत से लगातार हो रहे भूस्खलन को रोकने के लिए कृत्रिम पहाड़ की परत लगाकर वरुणावत की ढलान को स्थिर किया जाएगा. भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अभी वरुणावत पर हज़ारों टन ऐसा मलबा पड़ा है जो कभी भी ख़तरनाक रूप धारण कर सकता है. सितंबर 2003 से शुरू हुए इस भूस्खलन में अब तक हज़ारों लोग बेघर हो चुके हैं और छह सौ से भी ज़्यादा इमारतों के साथ ही क़रीब 10 करोड़ की संपत्ति का नुक़सान हुआ है. हालाँकि इन दिनों सूखे मौसम के कारण भूस्खलन की तेज़ी कुछ थम गई है लेकिन अब भी रुक-रुक कर वरुणावत से गिर रहे पत्थर और पेड़ों की वजह से लोग किसी अनहोनी की आशंका में जी रहे हैं. उत्तरकाशी के निवासी कृष्ण भंडारी बताते हैं, "ज़रा सी भी ओस गिरती है तो रात में पत्थरों का गिरना चालू हो जाता है. हम तो कई बार जागकर रात काटते हैं." गंगोत्री और यमुनोत्री का द्वार समझा जाने वाला उत्तरकाशी तश्तरी के आकार में पहाड़ों की तलहटी में बसा है. भागीरथी इसके बीच से बहती है. शहर का पुराना इलाक़ा वरुणावत की तलहटी में है और अचानक इस पूरे इलाक़े को तब ख़तरा पैदा हो गया था जब 24 सितंबर को अचानक ही वरुणावत धँसना शुरू हो गया. एक तरह से शहर का पूरा पुराना हिस्सा तो इस भूस्खलन में तबाह ही हो गया. इस भूस्खलन की ज़द में आ रही इमारतों को खाली करा लिया गया है और लोगों को राहत शिविरों में भेजा जा चुका है. विशेषज्ञों की राय भूवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के एक उच्च स्तरीय दल ने यहाँ का जायज़ा लेने के बाद कहा है कि पहाड़ की ढलानों और चोटी को मज़बूत और स्थिर करके ही इस विपदा को रोका जा सकता है.
देहरादून स्थित भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक डॉक्टर पीसी नोवानी कहते हैं, "इस भूस्खलन का कारण उत्तरकाशी में 1991 में आया भूकंप है. उस भूकंप की वजह से पहाड़ में दरारें पड़ गईं और बारिश में उसमें पानी भर गया." उनका कहना है कि पहाड़ इतना कमज़ोर हो गया है कि धँसना शुरू हो गया है. राज्य सरकार ने भूवैज्ञानिकों की सिफ़ारिश से ही वरुणावत को फिर से मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी टिहरी पनबिजली निगम को सौंपी है. ये निगम पड़ोस के टिहरी ज़िले में भागीरथी पर एशिया का सबसे ऊँचा बाँध बना रहा है. आपदा प्रबंधन समिति के सदस्य विजयपाल सिंह सजवान कहते हैं, "इस काम में 35 करोड़ का ख़र्च आएगा. सीमेंट और चारकोल से पहाड़ पर पर्त बनाई जाएगी. इस काम को अगली बारिश के पहले यानी जून तक पूरा होना है." उत्तरकाशी की स्थिति कुछ ऐसी है कि यहाँ प्रकृति का कहर टूटता रहा है. वर्ष 1978 में गंगा भागीरथी में आई बाढ़ से भारी तबाही हुई. वरुणावत पर्वत को 33 करोड़ देवी देवताओं का निवास और शिव को इस नगरी का रक्षक समझा जाता रहा है. वरुणावत के स्थाई उपचार की प्रक्रिया लंबी और पेचीदा होगी और तब तक शायद लोग इस विपदा को झेलने के लिए विवश हैं. |
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