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शनिवार, 20 दिसंबर, 2003 को 03:07 GMT तक के समाचार
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दम तोड़ती कंप्यूटर शिक्षा योजना

उत्तरांचल में एक स्कूल
जिन स्कूलों में बैठने की व्यवस्था नहीं वहाँ कंप्यूटर शिक्षा का क्या

करोड़ों की लागत से उत्तरांचल के स्कूलों में शुरू की गई कंप्यूटर शिक्षा योजना लगता है दम तोड़ रही है.

जिन स्कूलों में बच्चे टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ाई करते हैं वहाँ भी कंप्यूटर लगा तो दिया गया है लेकिन कंप्यूटर सिखाने-पढ़ाने वाला कोई नहीं.

बिजली की व्यवस्था न होने के कारण कंप्यूटर नहीं चल पा रहे हैं तो कहीं कंप्यूटर सिर्फ़ सजावट का सामान बन कर रह गए हैं.

देहरादून से क़रीब 13 किलोमीटर दूर नथुवावाला के हाई स्कूल में कंप्यूटर लगे लगभग चार महीने हो गई हैं लेकिन उदघाटन के बाद से कंप्यूटर कक्षा में कमोबेश ताला ही लगा हुआ है.

स्कूल के प्रिंसपल ब्रह्मपाल सिंह कहते हैं, "सबसे बड़ी समस्या ये है कि कंप्यूटर सिखाएगा कौन. शासन ने दो शिक्षकों को एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर में चार दिनों की ट्रेनिंग कराई थी लेकिन सिर्फ़ चार दिनों में क्या होता है. इतने में तो कोई कंप्यूटर बंद करना और चलाना ही सीख पाता है."

कुछ ऐसी ही स्थिति ऋषिकेश के नज़दीक सोदासिरोली गाँव के उच्चतर माध्यमिक स्कूल की भी है.

यहाँ भी तीन महीने पहले दो कंप्यूटर लगाए गए थे लेकिन स्कूल भवन में बिजली ही नहीं है.

जब कंप्यूटर चलाने के लिए जेनरेटर लगाया गया तो एक दूसरी ही समस्या खड़ी हो गई. वहाँ के शिक्षकों का कहना है कि जेनरेटर के शोर के कारण कंप्यूटर की पढ़ाई तो दूर की बात है सामान्य पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पाती.

इसी स्कूल के एक शिक्षक दीपक बंसल के अनुसार, "कंप्यूटर पढ़ाने का टार्गेट क्या है किसी को पता नहीं. बस इतना फ़ायदा हुआ है कि गाँवों के लोगों को भी कंप्यूटर के दर्शन हो गए."

समस्याएँ

उधर बच्चों की शिकायत है कि कंप्यूटर सिर्फ़ देखने भर के लिए है. आठवीं क्लास में पढ़नेवाले आनंद नेगी का कहना है कि "मास्टर जी का ध्यान इसी बात पर लगा रहता है कि कहीं कंप्यूटर ख़राब न हो जाए. हमें तो कभी हाथ भी लगाने नहीं दिया जाता."


 सबसे बड़ी समस्या ये है कि कंप्यूटर सिखाएगा कौन. शासन ने दो शिक्षकों को एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर में चार दिनों की ट्रेनिंग कराई थी लेकिन सिर्फ़ चार दिनों में क्या होता है. इतने में तो कोई कंप्यूटर बंद करना और चलाना ही सीख पाता है

नथुवावाला स्कूल के प्रिंसपल

उत्तरांचल सरकार ने पिछले साल राज्य के सभी स्कूलों में कंप्यूटर की शिक्षा अनिवार्य बनाने के लिए महात्वाकांक्षी योजना शुरू की थी.

इसके तहत अब तक तीन चरणों में राज्य के 1123 स्कूलों में लगभग 500 कंप्यूटर लगाए जा चुके हैं.

इस पर क़रीब 42 करोड़ का ख़र्च आया है लेकिन अधिकांश जगह में उनका सदुपयोग नहीं हो पा रहा और कंप्यूटर एक तरह से धूल फाँक रहे हैं.

जानकारों का कहना है कि बेहतर होता कंप्यूटर लगाने से पहले सरकार स्कूलों में बुनियादी ढाँचा ठीक करती, जहाँ बच्चे ज़मीन पर बैठ कर पढ़ रहे हैं और ढंग की इमारतें भी नहीं हैं.

उनका कहना है कि ऐसा होने पर शायद सरकारी शिक्षा का कायापलट हो जाता.

समाजिक कार्यकर्ता अवधेश कौशल के अनुसार, "पहाड़ के सुदूर इलाक़ों में स्कूलों की हालत तो बेहद ख़राब है. वहाँ कंप्यूटर लगाने भर से कुछ हासिल नहीं हो सकता."

उधर सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में उप महाप्रबंधक शोभित श्रीवास्तव को उम्मीद है कि जल्दी ही इसका फ़ायदा मिल पाएगा.

उन्होंने बताया, "हमने एक ढाँचा खड़ा कर दिया है और अब उसे व्यवहार में सफल बनाने का हल भी निकल आएगा. किसी भी अच्छे काम में शुरू में दिक़्क़तें तो आती ही हैं."

लेकिन नथुवावाला स्कूल के प्रिंसपल ब्रह्मपाल सिंह कहते हैं कि सरकार ने बग़ैर ज़मीनी सच्चाइयों को देखे ही ये योजना लागू कर दी.

उन्होंने बताया कि जब तक स्कूलों में स्थायी कंप्यूटर शिक्षक न हों और कंप्यूटर रखरखाव के लिए ज़रूरी व्यवस्था न हो ये योजना लागू नहीं हो सकती.

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