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गुरुवार, 17 फ़रवरी, 2005 को 11:25 GMT तक के समाचार
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सरिस्का से ग़ायब होता वनराज

सरिस्का अभयारण्य
अभयारण्य में मानव गतिविधियाँ बहुत बढ़ी हैं
वन्य प्रेमियों के लिए एक बुरी ख़बर है. राजस्थान सरिस्का बाघ अभयारण्य में बाघों की मौजूदगी के कोई चिन्ह नहीं मिल रहे हैं.

कुछ साल पहले तक वहाँ 27 बाघ गिने गए थे लेकिन अब एक भी बाघ वहाँ नज़र नहीं आ रहा है. राज्य सरकार ने वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए एक टास्क फोर्स बनाई है.

रात के सन्नाटे में जब बाघ अंगड़ाई लेकर दहाड़ता है तो पहाड़ियों में उसकी आवाज़ ऐसे गूंजती है गोया वो जंगली जानवरों में मुनादी कर रहा हो कि ख़बरदार! जंगल के राजा पधार रहे हैं.

लेकिन सरिस्का के जंगलों में वनराज की यह दहाड़ अब शायद ही कभी सुनाई दे. सरिस्का अभयारण्य में वन रक्षकों की सैकड़ों आँखे 15 दिन तक वनराज को खोजती रहीं. इन वन रक्षकों ने जंगल का चप्पा-चप्पा छान मारा लेकिन बाघ कहीं नज़र नहीं आए.

सरिस्का के ये जंगल प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण को लेकर काम कर रहे राजेंद्र सिंह का कार्यक्षेत्र बने हुए हैं.

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं, "प्रकृति का यह ख़ूबसूरत प्राणी शिकार की भेंट चढ़ गया. सरिस्का में 1985 में खनन कार्य और मानव दबाव के कारण पाँच बाघ रह गए थे. हमने लड़ाई लड़ी और 470 खादानों को बंद कराया. उससे वहाँ बाघों के लिए दोस्ताना माहौल बना."

 सरिस्का खनिज की दृष्टि से समृद्ध है. पहले जंगल के राजा को ख़त्म करो और फिर जंगल, बाद में सरकार बड़े लोगों को खनिज पट्टे आबंटित कर देगी.
पर्यावरण कार्यकर्ता, राजेंद्र सिंह

राजेंद्र सिंह कहते हैं, "वर्ष 2001 में बाघों की संख्या 27 तक जा पहुँची थी. मैं डेढ़ साल तक जलयात्रा में घूमता रहा और लौटा तो देखा कि सरिस्का में बाघ नहीं रहे. यह बहुत दुख भरी खबर है."

नींद टूटी

वन विभाग की नींद तब टूटी जब कुछ वन्य प्रेमियों ने शोर मचाया. विभाग ने तीन सौ कर्मचारियों को जंगल में दौड़ाया लेकिन कोई भी बाघ की उपस्थिति की ख़बर लेकर नहीं लौटा.

भारत की पर्यटन और वन्य जीव सोसायटी के सचिव हर्ष वर्द्धन कहते हैं कि सरकार और वन विभाग को अब सरिस्का का नाम बाघ परियोजना की सूची से हटा देना चाहिए और बाघ अब वहाँ अतीत की बात हो गई है.

वह इसके लिए वन विभाग को कोसते हुए कहते हैं, "मुझे कोई हैरत नहीं हुई. मैं 10 साल से वन विभाग को आगाह करता रहा कि वन संरक्षण सरकार की प्राथमिकता से पीछे छूट रहा है और सरिस्का पार्क का प्रबंधन ठीक नहीं है. वहाँ चराई हो रही है और पार्क के बाहर खनन कार्य चल रहा है. इन हालात ने बाघों के समापन का रास्ता बना दिया."

सरिस्का में वनराज का अंदाज़
ऐसे दृश्य अब बीते ज़माने की बात हो गए हैं

जंगल का राजा शायद अपनी सल्तनत में ही मारा गया लेकिन वन विभाग ने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है.

राज्य के वन्य जीव प्रतिपालक अरुण सेन को लगता है कि वनराज यहाँ कहीं तो होंगे, "हमें मई में होने वाली गणना के नतीजों का इंतज़ार है. उसी से सही तस्वीर सामने आएगी. हमें भी गहरी चिंता है."

राजेंद्र सिंह कहते हैं, "सरिस्का खनिज की दृष्टि से समृद्ध है. पहले जंगल के राजा को ख़त्म करो और फिर जंगल, बाद में सरकार बड़े लोगों को खनिज पट्टे आबंटित कर देगी."

क़रीब 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सरिस्का अभयारण्य को 1978 में बाघ परियोजना में शामिल किया गया था.

सरिस्का में वैज्ञानिक पद्धति से वनों के प्रबंधन का इतिहास एक शताब्दी पुराना है. रियासत काल में भी वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए क़ानून बनाए गए थे.

इसमें कोई शक नहीं कि सुनहरे, पीले, रेशमी बालों पर काली रेखाओं से सज्जित बाघ बेहद खूँखार और शक्तिशाली है लेकिन उसे शायद मालून नहीं कि इनसान उससे भी ज़्यादा हिंसक और ख़तरनाक है इसलिए बाघ इंसान के हाथों शिकस्त खाता रहा है.

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