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सुंदरबन के मुहाने पर... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गलाचीपा से रात में चले तो हम नदी में थे. लेकिन अगले दिन की सुबह उठे तो पता चला कि हम समुद्र में आ चुके हैं. पूछने पर बताया गया कि हम बंगाल की खाड़ी में है. यहाँ से सुंदरबन का इलाक़ा शुरू हो जाता है. नाम पंजीकृत कराने के लिए हम सुपति बन कार्यालय में रूके जहाँ बहुत जंगलों में जाने की अनुमति नहीं थी. आस-पास घना जंगल था और उनमें से एक पेड़ पर सैकड़ों चमगादड़ लटके हुए थे. उनका पीला-पीला पेट साफ़ दिख रहा था एक साथ इतने उलटे लटके हुए चमगादड़ दिन में मैंने कभी नहीं देखे थे. मैं चमगादड़ देख ही रहा था कि पैरों के पास से साँप गुजरा. मैंने ध्यान ही नहीं दिया, लेकिन मेरे साथ खड़े वन अधिकारी ने कहा, “पीछे हो जाइए, आप बाल-बाल बचे हैं.” ये तो शुरूआत थी सुंदरबन की. आगे पता नहीं क्या-क्या देखने को मिलेगा. जब नौका आगे की ओर चली तो पानी के किनारे हिरण और मगरमच्छ भी दिखें. बताया गया कि ये मगरमच्छ धूप सेंक रहे हैं. नष्ट होती नस्लें कटका अभ्यारण्य सुंदरबन के उन इलाकों में से है जहाँ का रास्ता छोटी-छोटी नहरों से होकर गुज़रता है. यहाँ बड़ी तादाद में मिलते हैं सुंदरी पेड़ जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरबन पड़ा है. इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान, ऐसी नस्लें हैं जो सुंदरवन में पाई जाती हैं. यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों. पर जलवायु परिवर्तन के कारण मीठे और खारे पानी का मिश्रण गड़बड़ा रहा है और पेड़ मर रहे हैं. 90 के दशक में चक्रवात से रेत आने के कारण भी कई पेड़ नष्ट हो गए. |
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