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बांग्लादेश पहुंची बीबीसी की टीम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बांग्लादेश में पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं पर ख़बरें जुटाने के बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के विशेष प्रयासों के तहत एक नौका में कई पत्रकार देश के तटीय इलाक़ों का दौरा कर रहे हैं. इस नौका को नाम दिया गया है 'नदी के ज़रिए बांग्लादेश'. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की यह महत्वाकांक्षी योजना एक महीने चलेगी. इसके दौरान वर्ल्ड सर्विस की 17 भाषाओं से पत्रकार इस नौका पर सवार होंगे. महत्वपूर्ण है कि बीबीसी की इस नौका पर हर तरह के आधुनिक संचार माध्यम उपलब्ध हैं जिनसे इंटरनेट, रेडियो और टीवी के रिपोर्टर नौका से ही ख़बरें भेज सकते हैं. पर्यवरण एक बड़ी समस्या बांग्लादेश में पर्यावरण में बदलाव एक बड़ी समस्या रही है. वहाँ हज़ारों की संख्या में ऐसे लोग हैं जिनका घर समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण छिन गया है. सत्तर के दशक में जहां इस देश में आए चक्रवाती तूफ़ान में लाखों लोग बेघर हुए वहीं समय-समय पर यहाँ बाढ़ के कारण कई जानें जाती हैं. बीबीसी के इस कार्यक्रम की शुरुआत के मौक़े पर एक पत्रकार सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कई बांग्लादेशी पत्रकार पहुँचे और उन्होंने जमकर सवाल भी पूछे. उनके सवालों के जवाब बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कार्यकारी संपादक नाज़िस अफ़रोज़ और बीबीसी की बंगाली सेवा के अध्यक्ष सबीर मुस्तफ़ा ने दिए. मुद्दा जलवायु परिवर्तन पर 'इंटरगवर्नमेंटल पैनल' की रिपोर्टों से जुड़ा रहा. इस पैनल को हाल ही में संयुक्त तौर पर पूर्व अमरीकी उपराष्ट्रपति अल गोर के साथ नोबेल पुरस्कार मिला है. इस यात्रा के दौरान आईपीसीसी के दो सदस्य डॉक्टर सलीम उल हक़ और डॉक्टर अतीक रहमान भी नौका पर आएंगे. 'क्यों डरा रहे हैं?' प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में एक पत्रकार का प्रश्न था - 'आप क्यों यहाँ आकर सभी को डरा रहे हैं? क्यों बांग्लादेश की नकारात्मक छवि पेश कर रहे हैं?' उनकी बात कितनी सही थी या ग़लत ये बीबीसी के पाठक और श्रोता ही तय करेंगे, जिनके सामने बीबीसी के पत्रकार अपनी रिपोर्टों के ज़रिए इन समस्याओं की निष्पक्ष तस्वीर पेश करने की कोशिश करेंगे.
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