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वन संपदा का भविष्य आशाजनक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में जंगलों की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने वाली नई तकनीक से पता चलता है कि भविष्य में वनों की हालत को लेकर जो चिंता जताई गई है, स्थिति उतनी भी ख़राब नज़र नहीं आती है. शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा है कि उन्होंने जंगलों की पहचान के बारे में जो अध्ययन किया है उससे पता चलता है कि दुनिया भर में वनों की कमी वाली स्थिति से बेहतरी की तरफ़ अब कोई पड़ाव नज़र आने वाला है. इस अध्ययन में दुनिया भर में लकड़ियों के भंडार और वन संपदा का अनुमान लगाने की कोशिश की गई है यानी अध्ययन में सिर्फ़ उस इलाक़ों का अध्ययन भर ही नहीं किया गया जो पेड़ों से ढका हुए हैं. इस अध्ययन के परिणाम अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल एकैडेमी ऑफ़ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं. इस शोध पत्र के लेखकों में शामिल पेक्का काउप्पी का कहना था, "ये नए तथ्य उस स्थिति से बेहतर हैं जैसाकि पहले सोचा गया था." "हमें ऐसी संभावना नज़र आती है जिसमें वनों की कटाई की स्थिति से बेहतर हालात बन सकते हैं. हम कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहे हैं लेकिन ऐसी संभावना नज़र आ रही है." 'भरोसेमंद आँकड़े' हेलसिंकी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर काउप्पी ने कहा कि इस ताज़ा अध्ययन में पहले के अध्ययनों के मुक़ाबले ज़्यादा भरोसेमंद आँकड़े पेश किए गए हैं. इस रिपोर्ट में किसी देश की आर्थिक वृद्धि और वहाँ वनों की कटाई के मुक़ाबले नई वृक्ष संपदा में भी तालमेल के बारे में दिखाया गया है.
प्रोफ़ेसर काउप्पी का कहना था कि किसी भी देश में जंगलों को जानबूझकर तबाह नहीं किया गया बल्कि लोगों ने अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए जंगल काटे. उनका कहना था, "ग्रामीण इलाक़ों में लोग ग़रीब होते हैं और उनकी संख्या भी बढ़ती रहती है इसलिए उन्हें अपना पेट पालने के वास्ते खेतीबाड़ी करने के लिए ज़्यादा ज़मीन की ज़रूरत होती है." प्रोफ़ेसर काउप्पी का कहना था कि इससे झलकता है कि अगर लोगों के पास रोज़गार के वैकल्पिक साधन हों तो वनों पर दबाव कम हो सकता है. उनका यह भी कहना था कि सिर्फ़ ऐसा नहीं है कि खाते-पीते लोग वनों की कटाई नहीं करते हैं... लेकिन ऐसा भी ख़तरा महसूस किया गया है कि धनी देशों ने गुमराह करने वाली तस्वीर पेश करने की कोशिश की है क्योंकि वे अपनी वन संपदा का इस्तेमाल करने के बजाय ग़रीब देशों से लकड़ी का आयात करते हैं. प्रोफ़ेसर काउप्पी का कहना था, "यह एक गंभीर समस्या है. इसे अपनी पर्यावरण संबंधी समस्याओं को निर्यात करने का नाम दिया जा सकता है और दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि यह मौजूद है." उन्होंने कहा कि इस ताज़ा अध्ययन से जो परिणाम निकले हैं उसे सरकारों और नीति-निर्माताओं को असरदार रणनीतियाँ बनाने के में मदद के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें गोरिल्लों ने अपनी बुद्धि का प्रदर्शन किया01 अक्तूबर, 2005 | विज्ञान ओरंगउटान का वजूद ख़तरे में23 सितंबर, 2005 | विज्ञान 'हरित शहरों' के विचार को प्रोत्साहन05 जून, 2005 | विज्ञान लुप्तप्राय तेंदुओं की संख्या और घटी.22 जनवरी, 2005 | विज्ञान कीटों के मरने से जंगलों को फायदा27 नवंबर, 2004 | पहला पन्ना आमेज़न में कम होते जंगल27 जून, 2003 | विज्ञान इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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