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एक नदी के कितने नाम? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में हर कोस में बोली बदल जाने की बात सुनी थी लेकिन बांग्लादेश में तो हर-चार तीन कोस में नदी का नाम बदलते देखा. हमने दो दिनों में कोई ढाई सौ किलोमीटर की यात्रा की है और इतने में एक नदी का नाम कोई 15 बार बदल गया है. और कप्तान कहते हैं कि ये तो वो 15 नाम हैं जो उन्हें याद हैं. उनका कहना है कि कई बार तो हर गाँव में नदी एक नए नाम से जानी जाती है. बारीसाल में इसका नाम किरतनखला था, फिर अरिअल्खा बनी फिर संध्या, उसके बाद निसिंधा, गलाचीपा और फिर बुलेसर....और कई नाम तो मुझे भी याद नहीं रहे. अब हमारी नाव समुद्र के मुहाने की ओर पहुँच रही है. दोनों ओर सुंदरबन के घने जंगल हैं. हमें बता दिया गया है कि सुंदरबन के इन जंगलों में सिर्फ़ अधिकारी रहते हैं, लोग नहीं, इसलिए यहाँ बात करने के लिए किसी का मिलना कठिन है. सुंदरबन के जंगलों का 40 फ़ीसदी हिस्सा भारत में आता है और 60 फ़ीसदी बांग्लादेश में. हाल ही में सुंदरबन को विश्व विरासत में शामिल किया गया है. गलाचिपा गाँव की दास्तां बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में स्थित है कि गलाचिपा कस्बा या कहिए एक बड़ा सा गाँव. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव इस स्थान पर साफ़ दिखाई देते हैं, ऐसा हमें बताया गया था. गाँव में पहुँचने पर बड़ी संख्या में लोग हमारे पास आए और वो अपनी बात हम तक पहुँचाना चाहते थे. चाहे हम उनकी भाषा समझ पाए या नहीं. यहाँ ऐसे लोगों की संख्या अधिक थी जिन्हें जलवायु शरणार्थी कहा जाता है. अबू ताहिर रिक्शा चला कर गुजा़रा करते हैं. एक ज़माने में उनके पास कई बीघा ज़मीन होती थी लेकिन गलाचिपा में नहीं. गलाचिपा से सैकड़ों मील दूर बोला में. बोला में जब उनकी ज़मीनें जलमग्न हो गईं तो उन्हें पलायन करना पड़ा गलाचिपा की ओर जहाँ बाढ़ के बाद नई ज़मीन ऊपर आई थी. ताहिर कहते हैं,'' हम अस्सी के दशक में यहां आकर बसे..बोला में हमारे बाप दादा की ज़मीनें थीं लेकिन यहाँ तो बहुत ग़रीब हैं. हमारे पास कुछ नहीं है. अब कुछ वर्षों में यहाँ भी पानी आने लगा है. अब हमें यहाँ से भी भागना पड़ सकता है.'' गलाचिपा का कुछ हिस्सा बाढ़ में डूब जाता है और इन इलाक़ों में लोगों ने घर लकड़ियों के खंभों पर बनाए हैं. अस्थायी निवास लगते हैं ये. लेकिन निवासियों के लिए यही स्थाई घर हैं, टीन की छत और टीन की दीवारें भी लकड़ी के खंभों पर. कठिन समस्याएँ ये शरणार्थी कई तरह की समस्याएं झेल रहे हैं. पीने का पानी साफ़ तो है लेकिन मानसून से पहले खारापन आ जाता है.
स्थानीय व्यवसायी सपन साहा बताते हैं,'' ट्यूबवेल से पीने का पानी मिल जाता है लेकिन कभी कभी पानी खारा हो जाता है. ख़ास कर जनवरी से अप्रैल के महीने में पीने का पानी बदमज़ा हो जाता है. फिर बाढ़ आती है तो पानी का स्वाद ठीक हो जाता है.'' ग्रामीणों को जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं की जानकारी तो नहीं है लेकिन वो इतना ज़रूर समझते हैं कि मौसम में कुछ गड़बड़ होती रहती है. ये इलाक़ा उन इलाक़ों में शामिल है जहाँ सत्तर के दशक में ज़बर्दस्त चक्रवात आया था जिसमें लाखों लोगों की मौत हुई थी. बड़े बूढ़ों को वो चक्रवात अब भी याद है. शायद इसीलिए वो हर साल आने वाली बाढ़ से डरते भी हैं. बांग्लादेश की सेना से रिटायर्ड हुए मुस्तफ़ा कमाल कहते हैं कि सरकार को कुछ करना चाहिए. वो कहते हैं,'' तत्काल तो यहाँ भी तटबंध बनाना चाहिए ताकि बाढ़ का पानी गाँव में नहीं आए. नदी के पास रहने वालों को बहुत दिक्कतें होती हैं. थोड़ा भी पानी आए तो लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. तटबंध बनेगा तो पानी कम आएगा.'' गलाचिपा बड़ा गाँव है जहां कुछ घरों में टीवी है और कुछ अन्य आधुनिक सुविधाएं भी लेकिन अगर उनका जीवन चलता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मौसम की मर्ज़ी से. |
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