|
न जाने कितने कीड़े | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नदियों में रात बिताना कितना कठिन हो सकता है ये अब पता चला है. शाम बेहतरीन होती है इसमें कोई शक नहीं. नदियों के चौड़े पाट के कारण डूबता हुआ सूरज दिखता है और उसकी परछाईं अत्यंत सुंदर लगती है. लेकिन जैसे जैसे प्राकृतिक रोशनी ख़त्म होती है और नौका की बत्तियां जलती है... हो जाता है आक्रमण.. मच्छरों का और न जाने कितने प्रकार के कीड़े मकोड़ों का. कमरे के दरवाजे़ खिड़कियां बंद करो तो गर्मी और उमस... समझ में नहीं आता कितने मच्छर आपके शरीर को सुजा कर चले जाएंगे. हज़ारों की संख्या में कीड़े शरीर पर चिपटते ही परेशान करते हैं. बचने का एकमात्र उपाय.अंधेरे में जाइए. पहली रात के बाद अब नौका में व्यवस्था की गई है. सारी खिड़कियों पर मच्छरदानी लगा दी गई है.. तो अब ठीक है. वैसे नौका के अंधेरे कोने में ठंडी हवा आनंद देती है. बारीसाल से गोलाचिपा की दूरी मात्र चार घंटे की है नाव से लेकिन हमें गलाचिपा पहुंचने में 11 घंटे लगे... हमारी छोटी सी नाव रास्ता भटक गई थी.. रास्ता भटकने के बारे में किसी ने सुबह तक नहीं बताया था. सुबह में पता चला कि कुछ देर लग जाएगी. ख़ैर गलाचिपा पहुंच ही गए. गलाचिपा का शाब्दिक अर्थ है गला दबाना लेकिन इस नाम के पीछे कोई पृष्ठभूमि नहीं है.बस नाम है .. गलाचिपा में बीबीसी की पूरी टीम के स्वागत में ग्रामीण तो आए ही थे. लोगों से बात करने के बाद हमारे कुछ सहयोगी बच्चों के साथ खेलने भी लगे. मुझे तो लोग बांग्लादेश का ही समझ रहे थे क्योंकि मेरा रंग उनके जैसा था और मैं थोड़ी बांग्ला समझ भी रहा था लेकिन मेरे साथी विदेशी पत्रकारों से उनका एक ही सवाल था.. कौन से देश से आए हैं.... नाव का सफ़र एम वी एवोशर... छोटी सी नाव जिसमें कम से कम 12 पत्रकार. हम बांग्लादेश के बारीसाल नामक स्थान से नौका में चढे. यहां नदी को कीर्तनखला कहते हैं.
कुछ मीलों बाद इसका नाम बदल कर अरियलखा हो जाता है. रिपोर्ट लिखने के चक्कर में डूबते सूरज का नज़ारा नहीं देख सके लेकिन नारंगी रोशनी में नहाते हुए काम करने का अपना ही अनुभव था. नौका मटमैले पानी को काटती बढ़ रही थी. नदी का पाट कहीं कहीं इतना चौड़ा कि किनारे न दिखें और कहीं कहीं इतना संकरा कि किनारे से बच्चे जो़र से चिल्लाएं तो भी हम तक सुनाई पड़े. कहते हैं कि इन इलाक़ों में लोग कम ही आते हैं लेकिन स्थानीय लोग इस कठिन जीवन के अभ्यस्त हो चुके हैं. वैसे नौका एक छोटा सा बुश हाउस लगता है. सोमालिया, चीन, इंग्लैंड, रुस, ब्राज़ील, पाकिस्तान और ज़ाहिर है बांग्लादेश के कई पत्रकार हैं जो लंदन के कार्यालय बुश हाउस की याद भी दिला जाता है... |
इससे जुड़ी ख़बरें बीबीसी हिंदी की रेडियो डॉक्युमेंट्री पुरस्कृत05 नवंबर, 2007 | विज्ञान बदलेंगे, ताकि बदतर न हो बदलाव05 नवंबर, 2007 | विज्ञान बंगलादेश पर मंडराता 'ख़तरा'04 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बांग्लादेश पहुंची बीबीसी की टीम30 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मानव गतिविधियों से बढ़ रहा है तापमान'25 सितंबर, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन से बढ़ता बाढ़ का ख़तरा29 अगस्त, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन से ‘धरोहरों को ख़तरा’24 जून, 2007 | विज्ञान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||