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कॉर्बेट में बढ़ी बाघों की तादाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में बाघों का घनत्त्व एशिया में सबसे ज़्यादा पाया गया है. देहरादून स्थित भारतीय वन्य-जीव संस्थान द्वारा की गई बाघों की अखिल भारतीय गणना में कॉर्बेट में प्रति 400 वर्ग किमी में 74 बाघ पाए गये जो कि किसी एक आवास-स्थल में बाघों की सबसे ज़्यादा है. अगर कुल संख्या देखें तो रिपोर्ट के मुताबिक 1973 में कॉर्बेट उद्यान में सिर्फ़ 44 बाघ थे जो कि अब बढ़कर 175 हो गये हैं. इतनी बड़ी गिनती में बाघ पाए जाने से ज़ाहिर है कि कॉर्बेट प्रशासन काफ़ी उत्साहित है. कॉर्बेट के निदेशक राजीव भतृहरि कहते हैं,"बाघ हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक हैं और इतनी बड़ी संख्या में कॉर्बेट उद्यान में उनकी उपस्थिति हमारे लिये ख़ुशी की बात है." भारतीय वन्य-जीव संस्थान वन और पर्यावरण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है और उसने शोध कार्यों के लिये इस वर्ष बाघों की ये अखिल भारतीय गिनती की है. कॉर्बेट पार्क की पिछले हफ्ते ज़ारी रिपोर्ट में ये तथ्य उजागर हुआ. 17 राज्यों में जिन 27 जगहों पर 'प्रोजेक्ट टाइगर' यानी बाघ परियोजना चल रही है वहाँ ये गिनती कराई गई. इनमें सुंदर बन, बाँधवगढ़, तमिलनाडु और कर्नाटक के प्रमुख आवास-स्थल शामिल हैं. कैमरा-ट्रैपिंग संस्थान के निदेशक आरपी सिन्हा कहते हैं," हम जानते हैं कि बाघ एक स्थिर रहने वाला पशु नहीं है और उसकी गिनती करना एक कठिन काम है लेकिन कैमरा-ट्रैपिंग के जिस तरीके से ये गणना की गई है वो काफी हद तक वैज्ञानिक है और इसमें ग़लतियों की गुंजाइश बहुत कम है." "हमारे लिये ये महत्वपूर्ण बात है कि कॉर्बेट में बाघों का घनत्व इतना अच्छा घनत्व है जो संभवतः विश्व में सबसे ज़्यादा हो सकता है." कैमरा-ट्रैपिंग विधि के तहत पहले बाघों के पदचिन्हों की पहचान और गिनती की जाती है और उसके बाद किसी एक वन क्षेत्र का नमूना लेकर वहां एक लंबी अवधि के लिये कई सारे कैमरे लगा दिये जाते हैं. बाघ जब इनके सामने से गुजरता है तो उसका चित्र खिंच जाता है. वन्य-जीव विशेषज्ञ इन चित्रों का वैज्ञानिक तरीके से आकलन करते हैं और सांख्यिकी फ़ॉर्मूले के तहत उसका घनत्व निकाला जाता है. कॉर्बेट में 400 वर्ग किमी के क्षेत्र में ऐसे 60 कैमरा-ट्रैप्स लगाए गये थे. ग़ौरतलब है कि शावकों के साथ बाघिन के भी कई चित्र मिले जो कि एक अच्छा लक्षण माना जाता है. बाघ रूस सहित एशिया के 12 देशों में पाये जाते हैं. वन क्षेत्र जहाँ सरिस्का जैसे वन क्षेत्रों में बाघ नहीं बचे हैं कॉर्बेट में ये कैसे संभव हो पाया. इस सवाल का जवाब देते हुए वन्य-जीव विशेषज्ञ आनन्द सिंह नेगी बताते हैं,"शुरूआत में कॉर्बेट का वनक्षेत्र सिर्फ 520 वर्ग किमी था लेकिन 1991 में आसपास के वन क्षेत्रों को भी उसमें जोड़कर इसका विस्तार करीब 1285 वर्ग किमी कर दिया गया और यहां बसे आबादी वाले कई गांवों और इलाक़ों को खाली कराया गया. उसका परिणाम अब सामने आ रहा है. इससे बाघों को बहुत सुविधा मिली और उनकी गिनती तेज़ी से बढ़ी." साथ ही विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि कॉर्बेट में अब सुरक्षा का स्तर और बढ़ाना होगा और उसके क़रीब के रामनगर और लैंसडाउन वन प्रभाग को भी सुरक्षित क्षेत्र घोषित करना होगा क्योंकि बाघ के लिये विशाल क्षेत्र ज़रूरी है और कॉर्बेट के सुरक्षित क्षेत्र के बाहर निकलने से ही अक्सर उन्हें ख़तरा है. बाघों को शिकारियों और आबादी से होने वाली मुठभेड़ से भी ख़तरा रहता है. इसके साथ ही संरक्षण-प्रबंधन को भी और मजबूत करने की सिफारिश की जा रही है. पिछले 10 महीनों में वहां सात बाघों की मौत हो चुकी है. | इससे जुड़ी ख़बरें बाघों की घटती संख्या पर सरकारी सुस्ती29 जून, 2006 | भारत और पड़ोस रणथंभौर के पर्यटन व्यवसाय में खलबली10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भारत में बाघों की गिनती का कार्यक्रम16 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस वनराज की खाल का बढ़ता बाज़ार27 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'श्रीलंका में विद्रोहियों के हमले में तीन मरे'07 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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