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वनराज की खाल का बढ़ता बाज़ार

बाघों की खाल दिखाते वन्य जीव संरक्षण से जुड़े एक कार्यकर्ता
दो प्रमुख वन्य जीव संरक्षण संस्थाओं ने भारत और चीन से अपील की है कि वे बाघों के खाल के अवैध व्यापार पर तत्काल रोक लगाने के लिए ठोस क़दम उठाएँ.

इन संगठनों का कहना है कि हाल में किए गए उनके ख़ुफ़िया सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारतीय बाघों को खाल के लिए मारे जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है.

एन्वायर्नमेंटल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी और वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ने जाँच के बाद कहा है कि तिब्बत के ल्हासा क्षेत्र में भारतीय बाघों की खाल और उनसे बने सामान खुलेआम ख़रीदे और बेचे जा रहे हैं.

उनका कहना है कि पिछले वर्ष जिस तरह की भयावह तस्वीर सामने आई थी उसके बाद स्थिति सुधरने के बदले और बिगड़ी ही है.

वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया की प्रमुख बिलिंडा राइट कहती हैं, "चिंता की बात ये है कि यह कारोबार बढ़ने के बदले घट रहा है, चीन के अमीर लोग बाघ की खाल से घरों को सजा रहे हैं और एक-दूसरे को तोहफ़े दे रहे हैं."

चिंता
 चिंता की बात ये है कि यह कारोबार बढ़ने के बदले घट रहा है, चीन के अमीर लोग बाघ की खाल से घरों को सजा रहे हैं और एक-दूसरे को तोहफ़े दे रहे हैं
बिलिंडा राइट

इन संगठनों ने पत्रकारों को एक फ़िल्म भी दिखाई जिसे तिब्बत के लितांग उत्सव के दौरान शूट किया गया है, इसमें पर्यटक और आम लोग ही नहीं बल्कि सरकारी अधिकारी भी बाघ की खाल से बने कपड़े पहनकर घूमते नज़र आते हैं.

वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के नितिन देसाई बताते हैं, "सितंबर 2005 से लेकर अब तक बाघों की 27, तेंदुओं की 199 और ऊदबिलाव की 254 खालें भारत और नेपाल से बरामद की गई हैं."

अपराधी

देसाई का कहना है कि संगठित आपराधिक गिरोह वन्य जीवों की खालों की तस्करी के काम में लगे हैं और इसमें वे जंगल में रहने वाले घूमंतु चरवाहों से मदद लेते हैं जिन्हें जानवरों के बारे में काफ़ी जानकारी होती है.

भारत में बाघ विलुप्त होने के कगार पर

देसाई बताते हैं कि वे बाघों को जाल बिछाकर फँसाते हैं और बहुत निर्ममता से मार डालते हैं, उनका कहना है कि वे सिर्फ़ आधे घंटे के भीतर बाघ की खाल उतारकर फरार हो जाते हैं.

जाने-माने बाघ विशेषज्ञ वाल्मिक थापर का कहना है कि यह बहुत ही शर्म की बात है कि भारतीय वन एवं पर्यावरण विभाग इस चुनौती से निबटने के लिए तैयार नहीं है.

वे कहते हैं, "कर्मचारी बूढ़े हैं, उन्हें बहुत कम तनख्वाह मिलती है, ट्रेनिंग नहीं है, सुविधाओं की कमी है जबकि शिकारी बहुत ही शातिर हैं और उनके पास सारे आधुनिक साधन हैं."

वे बताते हैं कि सौ वर्ष पहले एशिया में एक लाख से अधिक बाघ थे लेकिन अब दुनिया भर में बाघों की संख्या पाँच हज़ार से भी कम रह गई है.

भारत में बाघों की संख्या लगभग दो हज़ार के आसपास आँकी गई है लेकिन ताज़ा गिनती के आँकड़े अभी सामने नहीं आए हैं.

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